Sunday, 20 September 2015

जो लोग समझते हैं कि केवल साहित्य रचना से हिन्दी भाषा ज्ञान समृद्ध हो जायगी वे बहुत भारी मुगालते में हैं ।कोई भी भाषा सम्पूर्ण जीवन व्यवहार को जब तक ज्ञान के दायरे में नहीं लाती तब तक वह अपंग रहती है।हिन्दी के लगभग सभी जीवन क्षेत्र अभी तक अपने ज्ञानात्मक व्यवहार के लिए अंग्रेजी पर निर्भर हैं,इसलिये वह एक टांग पर घिसट रही है ।इस स्थिति को जब तक खत्म नहीं किया जायगा ,उसकी विकलांगता समाप्त नहीं होगी ।हिन्दी क्षेत्र के विश्वविद्यालय यदि ईमानदारी से कमर कस लें तो दस साल में आसानी से इस काम को कर सकते हैं।
अंग्रेजी में गौरव का अनुभव और उसका सतत बखान करने वाला समाज जब हिन्दी की बात करता है तो हंसी आए बिना नहीं रहती ।
हिन्दी दिवस के नाम से चालू हुए कर्मकाण्ड से अब जितनी जल्दी मुक्ति मिल जाय उतना ही हिन्दी का भला है ।इससे ऊर्जा,समय और धन तीनों की बचत होगी और हिन्दी दिवस के नाम से होने वाले पाखण्ड से भी मुक्ति मिलेगी ।हिन्दी को ज्ञान समृद्ध बनाकर ही उसे विश्वभाषाओं में स्थान दिलाया जा सकता है।
कोई भी भाषा अपने आधार भाषाई समूह की रागात्मक एवं तार्किक इच्छा शक्ति से विकसित व
प्रतिष्ठित होती है ।
जीना वही सिखा सकता है जिसने खुद पहले अच्छी तरह से जीना सीख लिया हो ।
देश में
स्कूल ,कालेज
और बडे आकार वाले
अनेक विश्वविद्यालय हैं
लेकिन शिक्षा नहीं है ।
तानाशाह
तभी पैदा होता है
जब लोगों में
तानाशाही की चाहत
पैदा कर दी जाती है ।