Wednesday, 4 December 2013

चारों हिंदी प्रदेशों के एक्ज़िट पोल के  कयास जो बतला  रहे हैं ,वे सत्ता विरोधी गुस्से का प्रतिफलन ज्यादा है , उसमें नमो को मुफ्त का यश मिलने से नहीं रोका जा सकता   । सच तो सत्ता विरोधी लहर ही  है । वह जहां कांग्रेसी सत्ता  के विरुद्ध है वहीं भाजपा के भी । किन्तु यदि इसका फायदा सिर्फ  भाजपा को ही  मिलता है तो सन्देश में मोदी का नाम जोर-शोर से प्रचारित किया जायगा ।दिल्ली में जहां अति-नया विकल्प खड़ा हुआ , वहाँ वह अपना रंग दिखा रहा है । इसका मतलब यह हुआ कि यदि जेनुइन जन-हृदय स्पृशी- तीसरा विकल्प होता तो आज अन्य प्रदेशों में भी बात बदली हुई होती । 

Tuesday, 3 December 2013

राजनीति में जातिवाद और सम्प्रदायवाद का नाग  अपना फण फैलाये घूम रहा है । सावधान रहने की जरूरत है यद्यपि सपेरों की बड़ी कमी महसूस हो रही है ।
विभ्रम फैलाकर सब कुछ समेट  लेने की सत्ताकांक्षा, व्यक्ति को इंसानियत के दर्जे से बहुत नीचे गिरा देती है । जब व्यक्ति तर्कशून्य या कुतर्की हो जाता है तो आपसदारी में भी वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो जाती है लेकिन रहते हैं  वे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे ।

Monday, 2 December 2013

उदासीनता,तटस्थता , मौन और अवसरवाद में मायने के फर्क भले  हों , परिणामों में ये लगभग एक जैसे होते हैं ।' कोउ नृप  होउ हमहीं का हानी' वाला नृपतन्त्रीय दृष्टिकोण लोकतंत्र के लिए बहुत  घातक एवं खतरनाक  होता है ।

खराब जो भी होता है , वह खराब ही होता है चाहे फिर वह कविता हो या आलोचना ।खराब कविता से खराब आलोचना लिखी जाती है और खराब  आलोचना से खराब कविता की पैदावार बढ़ जाती है ।  खराबी एक संक्रामक रोग की तरह होती है । जैसे समाज का जातिवाद और सम्प्रदायवाद राजनीतिक तंत्र और सत्तास्वरूपों को अपने जैसा बना देते हैं ।रावण अपने राज्य को भी अपने जैसा ही रहने की कुबुद्धि का प्रसार करता है । 

Sunday, 1 December 2013

लाल किले की प्राचीर
कभी झूठ नहीं बोलती
वह तुम्हारा धंधा है
सत्ता की भूख
काले नाग से ज्यादा
खतरनाक होती है
वह झूठ के किले बनाती है
और बहुरुपियों का स्वांग बनाकर
माया की तरह  भरमाती है

इस भूख की लपट
से जो बचेगा
वही सरोवर की निर्मलता
 और मनोहर घाटों को
बचा सकेगा । 

वह मतदाता बधाई का हक़दार है , जो लोकतंत्र की प्रक्रिया में स्वप्रेरणा से भागीदार बना है । इसी वजह से कल राजस्थान विधान सभा के गठन के लिए जिस तरह उमंग-भाव से मतदान हुआ ,वह इतिहास के एक मील-प्रस्तर की तरह बन गया । इस बार हर बार से अधिक ७४ प्रतिशत से अधिक मतदान होने के  कई मायने निकल रहे हैं , सही बात तो परिणाम ही बतलायेंगे किन्तु इतना जरूर है कि  वे चौंकाने वाले हो सकते हैं ।बहरहाल,  लोकतंत्र  की प्रक्रिया में लोक की भागीदारी का बढ़ना स्वागत योग्य है । निर्वाचन विभाग की व्यवस्थाएं ,प्रचार तंत्र , विकसित होती राजनीतिक प्रक्रिया  , सत्ता पाने की लालसा -आकांक्षा ,जाति -सम्प्रदायों की अपने नेता चुनने की संकीर्ण सोच वाली  ध्रुवीकृत एकजुटता, नए  मतदाताओं  की सक्रियता , पार्टीगत  मनोरचना आदि की भूमिका से जो माहौल बना , उसने मतदाता  को  उत्साहित  करते हुए पोलिंग बूथ तक पहुचाया । यह शुभ संकेत है जो आगे राजनीतिक प्रक्रिया को और सुदृढ़ करेगा , ऐसा माना जा सकता है ।