Sunday, 28 April 2013

प्रिय शिरीष एवं सुबोध जी, दोनों को एक साथ बधाई । केशव की कविता पर लिखे पूरे आलेख को दो बार पढ़ा ।सब्से पहले सुबोध जी की आलोचना-भाषा का एक अलग तरह का असर मन पर हुआ ।यह हिन्दी आलोचना-भाषा का एक नया और विकसित होती भाषा का एक नया रूप है जिसमें कभी संज्ञा को विशेषण पीछे छोड़ देता है तो कभी विशेषण संज्ञा को । यह नया रूप हम जैसे लोगों को हिन्दी की जातीय प्रकृति से दूर छिटकता -सा नज़र आता है । यह युवा जीवन में सभ्यतागत नवीनता का असर भी हो सकता है । जैसे कविता होते हुए भी कविता कभी एक सी नहीं रहती वैसे ही आलोचना-भाषा भी । इसके बावजूद इसकी खासियत है ---मानवता की आधारभूत  विचार-दृष्टि से इसका दूर न होना ।यह इसकी ताकत है जिसने कविता में लोक के समावेश को अलग होकर देखा है ।अन्यथा लोक को देखकर बिदकने का स्वभाव एक मूलाविहीन मध्यवर्ग ने बना लिया है ।
             जहाँ तक केशव की कविता का सवाल है मैं उसकी बनक और खनक का बहुत पहले से कायल रहा हूँ । वहां विचार-दृष्टि जीवन के रास्ते से होकर आती है इस वजह से वह अपना अलग प्रभाव छोडती है । वहां लोक की तोता -रटंत या फार्मूलेबाज़ी नहीं है। उसमें आज के युग का मेहनतकश , उसका संघर्ष ,उसकीसंभावनाएं और उसका सौन्दर्य रच-पच  कर आता है ।

Thursday, 28 February 2013

बोहरा जी ने सही सवाल उठाया है ।इसकी वजह लोक  शब्द का प्रयोग अनेक संदर्भी होना है ।जहां तक मैं समझ पाया हूँ , आज की कविता को जब हम लोक के सन्दर्भ में परिभाषित करते हैं तो उसका सन्दर्भ ----वर्गीय ----होता है ।जब से सरप्लस पैदा हुआ और समाज वर्गों में विभक्त हुआ तभी से हमारा सोच भी वर्गीय होता गया , जो होना जरूरी था ।इससे द्वंद्व की स्थिति उत्पन्न हुई ।दूसरे  , अभिजात और कुलीन लेखन से भिन्न लोकजीवन यानी किसान जीवन के स्तर पर लोक साहित्य की एक समानांतर धारा प्रवाहित होती रही , लोक उस अर्थ में भी रूढ़ हुआ ।इससे भिन्न लोक शब्द अपने अर्थ के साथ और जीवनानुभवों के रूप में शास्त्रीय परम्परा के प्रवाह रूप में चले आ रहे साहित्य को भी नया रूप देता रहा ।आज के समाज की वर्गीय संरचना को देखें तो स्पष्ट हो जायगा कि मौजूदा स्थितियों में --- लोक का सन्दर्भ ख़ास तौर से निम्न मेहनतकश वर्ग से है ।इस रूप में आज का लोक भक्तिकालीन लोक से अलग नया अर्थ रखता है ।इसे हम लोकतंत्र शब्द में प्रयुक्त लोक से भी समझ सकते हैं ।जहाँ यह लोक साहित्य से अलग हो जाता है ।निराला की परवर्ती कवितायें लोकानुभावों पर आधारित कवितायें ही तो हैं ।आज हिंदी कविता का सृजन करने वाले दो  वर्ग हैं ----मध्य और निम्नमध्य  ।निम्नमध्यवर्ग की अनुभूतियों में जहां देश के श्रमिक-किसान आते हैं वहाँ लोक की उपस्थिति रहती है ।चूंकि , आज भी हमारे देश में खेती और किसानी का बहुमत है , इस वजह से गाँव की बात कुछ ज्यादा आ जाये और उसके साथ प्रकृति आ जाय तो यह अनुभव को सहेज कर ही आता है , न कि किसी तरह के रूपवाद के तहत ।

Friday, 15 February 2013

केशव तिवारी हमारे समय के उन कवियों में हैं जो बिना शोर मचाये व्यापक जीवनधर्मी कविता रचते रहने में विश्वास  करते हैं ।इसकी वजह है उनका निरंतर श्रमशील जीवन  और जीवित चरित्रों के बीच में संलग्न संवेदनशीलता के साथ रहना ।मैंने उनके साथ रहकर स्वयम देखा है कि वे कैसे एक मेहनतकश को अभावग्रस्तता में जिन्दगी गुजारते देखकर विचलित हो जाते हैं और उसके लिए वह सब करते हैं ,जिसे सामान्यतया लोग शब्द-सहानुभूति देकर विदा कर देते हैं ।उनकी एक कविता है छन्नू खान और उनकी सारंगी वादन कला पर , यह बांदा का एक जीवित चरित्र था ,जो केशव जी की जिन्दगी में उनके घर-परिवार का तरह शामिल था ।कहने का तात्पर्य यह है कि केशव कविता लिखते ही नहीं वरन उसे जीते भी हैं ।जो जीकर कविता लिखता है , वही कबीर ,तुलसी,सूर,मीरा ,निराला , मुक्तिबोध ,नागार्जुन,केदार  की काव्य-परम्परा को आगे ले जाने की क्षमता रखता है । वे केदार बाबू की काव्य-पाठशाला के सजग विद्यार्थी रहे हैं , यह हम सब जानते हैं ।जिन्होंने भी दुनिया में बड़ी रचना की है , उन्होंने अपने जीवन और कविता के सेतु को मिलाये रखा है ।केशव की कविताओं में मुझे उनके जीवन और कविता का एक मजबूत सेतु नज़र आता है , जो उनकी कविता को सामान्य और विशिष्ट की द्वन्द्वात्मकता में आज की कविता बनाता है ।उनकी एक खासियत और है --अपनी परम्परा से गहरा रिश्ता ।यह आज के बहुत कम कवियों में देखने को मिलता है ।परम्परा भी कविता की नहीं , पूरे जीवन की ।उनकी रचना का आधार बहुत मजबूत है , जो उनको भविष्य के एक संभावनाशील कवि के रूप में स्थापित करता है ।।


 

Sunday, 10 February 2013

खेतों पर कोहरा है

इस बार
गाँव खेड़े पर पंहुचा
तो देखा
कि इक्कीसवीं सदी  के
कुछ काले पीले फूल
इस आँगन में भी
खिलने लगे हैं
गौरैया गाना और
चहकना भूल गयी है
नीम ने सावन में
निबौरी के गीत
अनमने मन से गाये हैं
सर्दी के विरुद्ध
रहने वाले आग-अगिहाने
उसकी तारीफ़ के
पुल बाँध रहे हैं
ऐसा कभी सोचा न था
समय इस मुआफिक
निस्तेज होगा

सांस फूलती है
अलगाव के शिखर को देखकर
खेड़े की चावड के मढ़ पर
खून के छींटे हैं
भेरों के माथे का सिन्दूर
पिघल कर
मोरी में बह रहा है
और भोमिया का ठान
भटकटैया के झाड़ों से
भर गया है
जागरण में सुषुप्ति
के गीतों को
पसंद करने वालों में
इजाफा हो रहा है
आस्था के शहतूतों को
शाखामृग तोड़ कर खा रहे हैं
दलालों के बाज़ार
चौराहों पर सजे हैं
और खेतों पर कोहरा
फसलों की उठान को
सांड की तरह रौंद रहा है


खाप पंचायतों ने
यौवन की बजती प्रेम-बांसुरी
को उतार दिया मौत के घाट
एक कपोत युगल की तरह ,
एक पुरानी  सूखी नदी के
बीहड़ जिंदगियों को लीलते रहे
चूल्हा-चौका ,खेत-पनघट
और घूँघट की संस्कृति को उन्होंने
आले में सजा कर रखा
खबर से मालूम हुआ
कि एक दलित दूल्हे की बिन्दौरी
पुलिस के संरक्षण में निकल पाई
बिरादरी और शैतान के गठजोड़ ने
सत्ता की बंदरबांट में
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को
घुटनों पर दौडाया
उसके जीवन-स्रोत इन्ही बीहड़ों में हैं
चांदनी रात में अँधेरे के जाल
पकड़ पाना आसान नहीं
विकास के पैरोकारों ने
गाँव में सडती कीचड को अनदेखा किया
किसान के हाथों और माथे पर
पडी लकीरों
और स्त्री के ललाट पर पड़े
चोट के निशान को
उन्होंने किसान के भाग्य
और स्त्री-योनि से  जोड़कर
व्याख्याएं की
शिक्षा-तंत्र ने रोशनी से ज्यादा
अन्धेरा फैलाया
जिससे बगुलों के पक्ष में
राजनीतिक फैसले हुए
खेत फसल से ज्यादा
खरपतवार से भरे रहे

पर यह सब होने के बावजूद
आदमी पहाड़ों की छाती पर बैठकर
वायुयान की तरह उड़ता रहा
उसने सागरो -महासागरों पर
बिस्तर की तरह शयन किया
मैंने इन्ही खेतों की मेंड़ों के पास
खलिहानों में
मेवाती लोक-कवि
साद्ल्ला के ---पंडू न के कड़े ---सुने
मेवात की जमीन से
एक नए महाभारत को वाणी मिली
आत्महनन करने के बावजूद
किसान ने कभी पैदावार से
मुंह नहीं मोड़ा
भूमि-पुत्रों ने सीमा पर
दुश्मन के दांत खट्टे किये
खेतों पर पसरे कोहरे का मुकाबला
अपनी साँसों के ताप से किया
भूमि को चौसर बना
मानवता की फसलें उगाई













































































































 



Thursday, 17 January 2013

युद्ध और शांति
जिनको कभी
रोटी तक के लिए
नहीं करना पडा संघर्ष
जिनके पांवों में
फटी नहीं कभी बिवाई
जो नहीं जानते
प्रसव पीड़ा
नहीं देखा तापता
गधा कभी
जो पैदा हुए
चांदी के चम्मचों में
जिनके घर में कोई
कभी नहीं बना सैनिक
जो राजघराने की
रजत - रज  में खेले
पिता  से मिले विरासत में
रिश्वतों से भरे गोदाम ,
जो किलों के कंगूरों से
लेते अभिवादन
वे ही दे रहे
आज गीता का
अर्जुनोपदेश
मानाकि शैतान का भूत
बातों से नहीं
लातों से मानता है
पर लात
की हकीकत को
पहचानना कम जरूरी नहीं
पहले उस दुश्मन को पहचानो ,
जो शैतान की पीठ पर
रखे हुए है हाथ ,
उस हाथ को देखो ,
जिससे तुमने दोस्ती का
झूठा राग आलाप रखा है
समझो सचाई ,शैतान भारी नहीं है
भारी है वह हाथ ,
जिसकी उँगलियों के पैने  नाखून
तुम्हें हमेशा से डराते आये हैं
दोस्त युद्ध में उतरो
जरूर उतरो
क्योंकि युद्ध भी एक
उपाय होता है
शैतान को ख़त्म करने का
पर युद्ध के अनेक होते हैं तरीके
पहले उनको लड़ो
लड़ो,लड़ो लड़ो
क्योंकि लड़ाई से ही
मालूम होगा कि तुम
कितने लड़ाई के पक्ष में हो ।





























युद्ध और शांति
जिनको कभी
रोटी तक के लिए
नहीं करना पडा संघर्ष
जिनके पांवों में
फटी नहीं कभी बिवाई
जो नहीं जानते
प्रसव पीड़ा
नहीं देखा तापता
गधा कभी
जो पैदा हुए
चांदी के चम्मचों में
जिनके घर में कोई
कभी नहीं बना सैनिक
जो राजघराने की
रजत - रज  में खेले
पिता  से मिले विरासत में
रिश्वतों से भरे गोदाम ,
जो किलों के कंगूरों से
लेते अभिवादन
वे ही दे रहे
आज गीता का
अर्जुनोपदेश
मानाकि शैतान का भूत
बातों से नहीं
लातों से मानता है
पर लात
की हकीकत को
पहचानना कम जरूरी नहीं
पहले उस दुश्मन को पहचानो ,
जो शैतान की पीठ पर
रखे हुए है हाथ ,
उस हाथ को देखो ,
जिससे तुमने दोस्ती का
झूठा राग आलाप रखा है
समझो सचाई ,शैतान भारी नहीं है
भारी है वह हाथ ,
जिसकी उँगलियों के पैने  नाखून
तुम्हें हमेशा से डराते आये हैं
दोस्त युद्ध में उतरो
जरूर उतरो
क्योंकि युद्ध भी एक
उपाय होता है
शैतान को ख़त्म करने का
पर युद्ध के अनेक होते हैं तरीके
पहले उनको लड़ो
लड़ो,लड़ो लड़ो
क्योंकि लड़ाई से ही
मालूम होगा कि तुम
कितने लड़ाई के पक्ष में हो ।

































युद्ध और शांति
जिनको कभी
रोटी तक के लिए
नहीं करना पडा संघर्ष
जिनके पांवों में
फटी नहीं कभी बिवाई
जो नहीं जानते
प्रसव पीड़ा
नहीं देखा तापता
गधा कभी
जो पैदा हुए
चांदी के चम्मचों में
जिनके घर में कोई
कभी नहीं बना सैनिक
जो राजघराने की
रजत - रज  में खेले
पिता  से मिले विरासत में
रिश्वतों से भरे गोदाम ,
जो किलों के कंगूरों से
लेते अभिवादन
वे ही दे रहे
आज गीता का
अर्जुनोपदेश
मानाकि शैतान का भूत
बातों से नहीं
लातों से मानता है
पर लात
की हकीकत को
पहचानना कम जरूरी नहीं
पहले उस दुश्मन को पहचानो ,
जो शैतान की पीठ पर
रखे हुए है हाथ ,
उस हाथ को देखो ,
जिससे तुमने दोस्ती का
झूठा राग आलाप रखा है
समझो सचाई ,शैतान भारी नहीं है
भारी है वह हाथ ,
जिसकी उँगलियों के पैने  नाखून
तुम्हें हमेशा से डराते आये हैं
दोस्त युद्ध में उतरो
जरूर उतरो
क्योंकि युद्ध भी एक
उपाय होता है
शैतान को ख़त्म करने का
पर युद्ध के अनेक होते हैं तरीके
पहले उनको लड़ो
लड़ो,लड़ो लड़ो
क्योंकि लड़ाई से ही
मालूम होगा कि तुम
कितने लड़ाई के पक्ष में हो ।




















































































Tuesday, 27 November 2012

सीता हरण के प्रसंग
इसलिए चाल अपनी बदलू ,भय प्रीति दिखाऊ (गा )इसको ।जैसे भी हो वैसे ही अब रेखा बाहर लाऊ इसको ।
चालबाज ही दुनिया में हर जगह राज वो करते हैं ।सच पर चलने वाले उनके घर पानी भरते हैं ।
सच पर चलते जो दृढ़ता से दुनिया में भूखो मरते हैं ।झूठ-कपट करने वाले सुक्ख नसेनी चढ़ते हैं ।
रावन की लंका सोने की ,राम भटकता है वन में ।आदेशों से नभ थर्राता ,भय बैठा मेरा जन जन में ।

मारीच से
सच पर टिकने वाले ने मामा ,हर युग में ही दुःख पाया है ।चालबाज छल कपटी ने अपना राज जमाया है ।
मेहनत करके जो पेट भरें वो कब जग में सुख पाए हैं ।मेहनत के गीत सदा से ही कमजोरो ने गाये हैं ।
मेहनत तो खूब गधे करते बैलो को जोता जाता है ।उन्हें हांकने वाला ही धन वैभव सब कुछ पाता है ।
इसलिए नीति की बातें सब कमजोरो के मन भाती हैं ।ताकतवर की मुट्ठी में जग रहा नीति बतलाती है ।

Monday, 22 October 2012

१९ अक्टूबर २०१२,सिडनी,आस्ट्रेलिया
मौसम का ऐसा मिजाज दुनिया में कम ही जगह होगा ,सुबह ,दोपहर ,शाम के साथ बदलता हुआ |जैसे रूपसी अपना श्रृंगार और रूप क्षण-क्षण में बदलती है |मेघों का उमड़ना तो यहाँ चुटकी बजते ही होता है |इन दिनों फूलों की बहार आई हुई है ,चटक गुलाबी,नीले,पीले ,सफ़ेद, बैगनी रंगों का जैसे उत्सव लगा हो |अभी इस देश के राजधानी नगर 'कैनबरा 'में कई रोज तक फूलों का मेला चला है ---लोक-उत्सव की तरह |मुझे दिल्ली के' फूल वालों की सैर' याद आ रही है |उत्सव मनाने में हमारे देश से सब नीचे पड़ते हैं |हमारे यहाँ कोई दिन ऐसा नहीं जो उत्सव-भाव के बिना हो |उत्सव भी एक-दो दिन नहीं पूरे सप्ताह-पखवाड़े तक चलते हैं |रो-रोकर दिन काटे तो क्या काटे ?गरीबी और विषमता तो जब मिटेगी तब मिटेगी ,इसलिए हमारे यहाँ गरीब भी मावस मनाये बिना नहीं मानता |लड़ते-झगड़ते ,संघर्ष करते उत्सवों के बीच रहना ,कुछ ऐसी ही प्रकृति है मेरे देश की |यह प्रकृति ही है जो दुनिया को सबसे पहले विश्वात्मा का चोला पहनाती है |जो सबको मुक्त-हस्त से अपनी दौलत बांटती है | दूसरे देश में पहला परिचय भी प्रकृति से होता है |ओल्ड्स पार्क में सुबह सैर करते हुए दो जगहों पर नीम-प्रजाति के दो पेड़ मिलते हैं |इन दिनों इनमें फूलों की बस्ती बसी हुई है |हमारे नीम के फूल से आकार में बड़ा है फूल इसका |गंध में भी अलग है |गंध का रिश्ता मिट्टी से होता है ,जैसा मिट्टी-पानी वैसी गंध |
नेट पर आज प्रसिद्ध कवि लोर्का की एक छोटी कविता पढी --------गर मैं मरू /खिड़की खुली छोड़ देना /छोटा बच्चा संतरे खा रहा है /{अपनी खिड़की से उसे मैं देख सकता हूँ } किसान गेंहू की फसल काट रहा है /{अपनी खिड़की से मैं उसे सुन सकता हूँ }गर मैं मरूं /खिड़की खुली छोड़ देना |"
बना रहे बनारस 'ब्लॉग पर इसे पढ़ा |कविता के दोनों बिम्ब सार्वदेशिक हैं और ठेठ जीवन की उपज हैं |बच्चे को संतरा खाते देखने की लालसा और किसान को फसल काटने से होने वाली क्रिया ध्वनि को सुनने की आकांक्षा कवि और पाठक दोनों को उनकी आत्मबद्ध दशा से मुक्त करती हैं |जीवन की सहज क्रियाएं व्यक्ति के मन को उदात्त बनाती हैं |इनमें भविष्य का एक कर्म-सन्देश भी है |आज जीवन में से जिस तरह सहजता का निष्कासन हो रहा है और उसकी जगह एक बनावटी सभ्यता ले रही है ,बच्चे द्वारा संतरे खाने की क्रिया में कवि उस सहज सौन्दर्य को देखना चाहता है |इसी तरह किसान की कर्मशीलता का सौन्दर्य है जो आदमी की बुनियादी जरूरत को पूरा करने से सम्बंधित क्रिया है |अद्भुत अर्थगर्भी व्यंजना के रंग में रंगी यह छोटी सी कविता अपनी भाव -पूर्णता में पाठक के मन को द्रवित करने की शक्ति रखती है |एक आधुनिक व्यक्ति की ऐसी आकांक्षाएं किसी को भी असमंजस में डाल सकती हैं कि मृत्यु की घड़ी में इतनी तुच्छ आकांक्षा |न मुक्ति की कामना ,न स्वर्ग की आकांक्षा और न ही आवागमन से मुक्त होने की इच्छा |जब लोक जीवन में कवि एक श्रम-रत किसान को देखने की आकांक्षा व्यक्त करता है तो उसके लिए श्रम जीवन-मूल्य की तरह बन जाता है |आज का कवि भी इसी श्रम-संलग्नता की तलाश में लोक में जाता है |
यहाँ मैं अपने चार वर्षीय पुत्र अभिज्ञान के साथ हूँ |उसकी सहज जीवन क्रियाओं को देखते हुए हमारे मन को भी इससे राहत मिलती है |


कृपया १९ अक्टूबर की डायरी में "चार वर्षीय पुत्र की जगह ----चार वर्षीय पौत्र पढने का कष्ट करें |"यह गलती अंगरेजी से हिंदी में बदलने की वजह से हुई |क्षमा करेंगे ----जीवन सिंह