Tuesday, 24 September 2013

यह मनुष्य ही है जिसके पास भाव और चिंतन दोनों की उच्चतम और संश्लिष्ट प्रणाली मौजूद है ।आजकल  एक उत्तर-आधुनिक चिंतन प्रणाली भी चल रही है जहां ध्यान रखने की बात यह है कि वह हमको मानवता के सही रास्ते से इधर-उधर भटकाती तो नहीं है ? आज भटकाव और ठहराव दोनों की ज्यादा चल रही है । जब तक हमारा चिंतन आज के मेहनतकश की तरफदारी में नहीं होगा ,तब तक भटकाव और ठहराव दोनों खतरे बने रहेंगे । तत्त्व-मीमांसा वह, जो हमको आज की मानवता अर्थात मेहनतकश से जोड़े । रहा अध्यात्म का सवाल आचार्य शुक्ल ने बहुत पहले ही इस धारणा का विरोध करते हुए लिखा है कि --"-आजकल अध्यात्म के चश्मे बहुत सस्ते हो गए हैं ।" वैसे अध्यात्म का शाब्दिक अर्थ है ----अपने से ऊपर उठना । अपने से ऊपर आप तभी उठ सकते हैं जबकि अपनी परवाह छोड़कर दूसरों की परवाह करें । दूसरे  कौन, जो सबसे ज्यादा मेहनत  करने के बावजूद , जिनको उसका प्रतिफल नहीं मिलता । उसे बीच का बिचौलिया हड़प जाता है ।

Monday, 23 September 2013

नारी लता

प्रकृति तुमने भी
उसी प्रकृति को चुना
जिसे प्रकृति ने
अपने अनुरूप रचा
जैसे मोनालिसा को बनाया
विंची ने
जैसे नदियों में
हिमालय से उतरी सुरसरि
जैसे भारत में लड़ा गया
पहला मुक्तिसंग्राम ।

 नारी लता न होती
तो यह दुनिया रहने लायक नहीं होती ।
संत कवियों की बात को लोक जीवन में  इसीलिये जगह मिली क्योंकि वे  कथनी और करनी का अंतर अपने  जीवन-व्यवहार के स्तर पर  नहीं रखते थे और न ही अवसरवाद को काम में लेते थे । जीवन में उनके सामने भी यद्यपि दरबारी प्रलोभन थे किन्तु उनके जीवन-दर्शन ने उनको उनसे दूर रखा ।रीति-कवि उनके लालच में फंसे तो महान रचना नहीं कर पाए ।  अब का लेखक लोभ-लालच, पुरस्कार , पद के जाल में जाने-अनजाने फंस  जाता है । अब दरबारदारी दूसरे  तरह की है । निराला, त्रिलोचन,नागार्जुन ,प्रेमचंद ,मुक्तिबोध, रामविलास शर्मा जी ने अपने उच्चस्तरीय नैतिकबोध के उदाहरण प्रस्तुत किये । वे आज भी अनुकरणीय हैं । उनके लेखन की  ऊंचाई उनके नैतिक बोध से निर्मित होती है ।

Friday, 20 September 2013

यह विभ्रम बहुतों को रहता है कि यदि वे स्थानीयता से जुड़े रहेंगे तो राष्ट्रीयता और वैश्विकता  से अलग समझ लिए  जायेंगे ।  वे नहीं जानते कि व्यक्ति  एक समय में एक ही जगह पर रहता  हैं , । भौतिक तौर पर कभी व्यक्ति पूरे विश्व में नहीं रहता , वह उसके इतिहास , भूगोल और दर्शन से विश्व को समझने का प्रयास करता है । इन्द्रिय बोध की भी एक सीमा होती है । ऐसे ही भावों -विचारों की भी । लेकिन इन सबको वह निरंतर व्यापक,विस्तृत और गहरा बना सकता है और विश्व - स्तर तक पहुच सकता है । यह तो स्पष्ट है कि  , इन्द्रिय-बोध और भाव के स्तर पर पूरी मानव-जाति में समानता है , उसकी अभिव्यक्ति के रूप -भिन्न हो सकते हैं । ऐसा नहीं होता तो कालिदास , गेटे को समझ में नहीं आता और गेटे को शायद ही कोई दूसरी जाति -भाषा का व्यक्ति समझ पाता । वारान्निकोव , तुलसी का रूसी में अनुवाद क्यों और कैसे करते ? सवाल जीवन-दृष्टि का है कि आप उसे देखते कहाँ से और किस कोण से हैं ? कवि जिस जमीन पर होता है , वही उसकी असली जमीन है और वहां कहने को बहुत कुछ मौजूद है । जहां प्रकृति और जीवन-संघर्ष करता हुआ मनुष्य है , वहाँ सब कुछ तो मौजूद है । वहाँ किस बात की कमी है । जरूरत है उसे देखने और उद्घाटित करते हुए व्यापक बनाने की । महान रचनाकारों ने कभी अपनी जमीन छोडकर नहीं लिखा है ।
साम्प्रदायिकता , और वह भी वोट के दिनों में उग्रवाद का रूप धारण कर लेती है । उस समय उसके विरुद्ध यदि कोई अपना खुला और दो टूक मंतव्य व्यक्त करता है तो उसका बहुत बड़ा मतलब होता है । उससे वे ताकतें विचलित हो जाती हैं , जैसा इस मामले में हुआ है ।अनंतमूर्ति के वक्तव्य की मार भीतर तक हुई है । रही पलायन की बात , ऐसे समय में ऐसा कहना भी अर्थ रखता है । यह मेरी समझ है । "अतिथि देवो भव " तो सारी दुनिया में होता है । दूसरी जगह भी अतिथि को कोई नहीं पीटता । आखिर में मकबूल फ़िदा हुसैन को भी किसी ने तो अपने यहाँ रखा । हम किसी की रक्षा नहीं कर पाते ,तभी तो व्यक्ति अकेला पड़ जाता है ।

Thursday, 19 September 2013

सर्जक होना ,
भोक्ता होने से
अच्छा लगता है
अच्छा लगता है जैसे
अमर बेल से
वृक्ष होना

अफसर -अहलकार होने से
अच्छा लगता है
खेत में फसल बोना

जैसे दलाल और नेता
होने से अच्छा लगता है
किसी बेलदार के संग नसेनी पर चढ़कर
दीवार पोतना ,
कतार में लगकर
रेल की टिकिट लेना
शयन यान में
सहयात्री से बतियाते
सुदूर यात्रा करना

सबसे अच्छा लगता है
सब कुछ होकर भी
आदमी होना ।
 कला के बिना जीवन अधूरा है । फिर चाहे वह शब्द की कला हो या रंग-रेखाओं की ।कला प्रस्तर को भी जीवन प्रदान करने की शक्ति रखती है । बशर्ते हो वह कला ----जीवन-सरिता की तरह प्रवाहित रहने वाली ।