यह मनुष्य ही है जिसके पास भाव और चिंतन दोनों की उच्चतम और संश्लिष्ट प्रणाली मौजूद है ।आजकल एक उत्तर-आधुनिक चिंतन प्रणाली भी चल रही है जहां ध्यान रखने की बात यह है कि वह हमको मानवता के सही रास्ते से इधर-उधर भटकाती तो नहीं है ? आज भटकाव और ठहराव दोनों की ज्यादा चल रही है । जब तक हमारा चिंतन आज के मेहनतकश की तरफदारी में नहीं होगा ,तब तक भटकाव और ठहराव दोनों खतरे बने रहेंगे । तत्त्व-मीमांसा वह, जो हमको आज की मानवता अर्थात मेहनतकश से जोड़े । रहा अध्यात्म का सवाल आचार्य शुक्ल ने बहुत पहले ही इस धारणा का विरोध करते हुए लिखा है कि --"-आजकल अध्यात्म के चश्मे बहुत सस्ते हो गए हैं ।" वैसे अध्यात्म का शाब्दिक अर्थ है ----अपने से ऊपर उठना । अपने से ऊपर आप तभी उठ सकते हैं जबकि अपनी परवाह छोड़कर दूसरों की परवाह करें । दूसरे कौन, जो सबसे ज्यादा मेहनत करने के बावजूद , जिनको उसका प्रतिफल नहीं मिलता । उसे बीच का बिचौलिया हड़प जाता है ।
Tuesday, 24 September 2013
Monday, 23 September 2013
संत कवियों की बात को लोक जीवन में इसीलिये जगह मिली क्योंकि वे कथनी और करनी का अंतर अपने जीवन-व्यवहार के स्तर पर नहीं रखते थे और न ही अवसरवाद को काम में लेते थे । जीवन में उनके सामने भी यद्यपि दरबारी प्रलोभन थे किन्तु उनके जीवन-दर्शन ने उनको उनसे दूर रखा ।रीति-कवि उनके लालच में फंसे तो महान रचना नहीं कर पाए । अब का लेखक लोभ-लालच, पुरस्कार , पद के जाल में जाने-अनजाने फंस जाता है । अब दरबारदारी दूसरे तरह की है । निराला, त्रिलोचन,नागार्जुन ,प्रेमचंद ,मुक्तिबोध, रामविलास शर्मा जी ने अपने उच्चस्तरीय नैतिकबोध के उदाहरण प्रस्तुत किये । वे आज भी अनुकरणीय हैं । उनके लेखन की ऊंचाई उनके नैतिक बोध से निर्मित होती है ।
Friday, 20 September 2013
यह विभ्रम बहुतों को रहता है कि यदि वे स्थानीयता से जुड़े रहेंगे तो राष्ट्रीयता और वैश्विकता से अलग समझ लिए जायेंगे । वे नहीं जानते कि व्यक्ति एक समय में एक ही जगह पर रहता हैं , । भौतिक तौर पर कभी व्यक्ति पूरे विश्व में नहीं रहता , वह उसके इतिहास , भूगोल और दर्शन से विश्व को समझने का प्रयास करता है । इन्द्रिय बोध की भी एक सीमा होती है । ऐसे ही भावों -विचारों की भी । लेकिन इन सबको वह निरंतर व्यापक,विस्तृत और गहरा बना सकता है और विश्व - स्तर तक पहुच सकता है । यह तो स्पष्ट है कि , इन्द्रिय-बोध और भाव के स्तर पर पूरी मानव-जाति में समानता है , उसकी अभिव्यक्ति के रूप -भिन्न हो सकते हैं । ऐसा नहीं होता तो कालिदास , गेटे को समझ में नहीं आता और गेटे को शायद ही कोई दूसरी जाति -भाषा का व्यक्ति समझ पाता । वारान्निकोव , तुलसी का रूसी में अनुवाद क्यों और कैसे करते ? सवाल जीवन-दृष्टि का है कि आप उसे देखते कहाँ से और किस कोण से हैं ? कवि जिस जमीन पर होता है , वही उसकी असली जमीन है और वहां कहने को बहुत कुछ मौजूद है । जहां प्रकृति और जीवन-संघर्ष करता हुआ मनुष्य है , वहाँ सब कुछ तो मौजूद है । वहाँ किस बात की कमी है । जरूरत है उसे देखने और उद्घाटित करते हुए व्यापक बनाने की । महान रचनाकारों ने कभी अपनी जमीन छोडकर नहीं लिखा है ।
साम्प्रदायिकता , और वह भी वोट के दिनों में उग्रवाद का रूप धारण कर लेती है । उस समय उसके विरुद्ध यदि कोई अपना खुला और दो टूक मंतव्य व्यक्त करता है तो उसका बहुत बड़ा मतलब होता है । उससे वे ताकतें विचलित हो जाती हैं , जैसा इस मामले में हुआ है ।अनंतमूर्ति के वक्तव्य की मार भीतर तक हुई है । रही पलायन की बात , ऐसे समय में ऐसा कहना भी अर्थ रखता है । यह मेरी समझ है । "अतिथि देवो भव " तो सारी दुनिया में होता है । दूसरी जगह भी अतिथि को कोई नहीं पीटता । आखिर में मकबूल फ़िदा हुसैन को भी किसी ने तो अपने यहाँ रखा । हम किसी की रक्षा नहीं कर पाते ,तभी तो व्यक्ति अकेला पड़ जाता है ।
Thursday, 19 September 2013
सर्जक होना ,
भोक्ता होने से
अच्छा लगता है
अच्छा लगता है जैसे
अमर बेल से
वृक्ष होना
अफसर -अहलकार होने से
अच्छा लगता है
खेत में फसल बोना
जैसे दलाल और नेता
होने से अच्छा लगता है
किसी बेलदार के संग नसेनी पर चढ़कर
दीवार पोतना ,
कतार में लगकर
रेल की टिकिट लेना
शयन यान में
सहयात्री से बतियाते
सुदूर यात्रा करना
सबसे अच्छा लगता है
सब कुछ होकर भी
आदमी होना ।
भोक्ता होने से
अच्छा लगता है
अच्छा लगता है जैसे
अमर बेल से
वृक्ष होना
अफसर -अहलकार होने से
अच्छा लगता है
खेत में फसल बोना
जैसे दलाल और नेता
होने से अच्छा लगता है
किसी बेलदार के संग नसेनी पर चढ़कर
दीवार पोतना ,
कतार में लगकर
रेल की टिकिट लेना
शयन यान में
सहयात्री से बतियाते
सुदूर यात्रा करना
सबसे अच्छा लगता है
सब कुछ होकर भी
आदमी होना ।
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