Tuesday, 31 December 2013

नए साल में करता हूँ मैं
सबकी मंगलकामना ।

खिलते फूलों -सी हर घर की बगिया हो ।
फागुन के आँगन -सा मन रंगरसिया हो । ।
एक अकेला ही ना हो,मालिक वैभव का ,
हर पेड़ जगत में , चन्दन -वन का बसिया हो । ।
सबको सब कुछ मिले, तभी कुछ जानना
नए साल में करता हूँ मैं
सबकी मंगलकामना

सीढ़ीनुमा जिंदगी से सबका पीछा छूटे
बंधन और पाश की दुनिया से सबका नाता टूटे
सब स्वाधीन,  स्वतंत्र ,सभी के पूरे हों सपने
कोई एक कभी दुनिया को ,डाकू-सा बन ना लूटे
वह भी दिन आयेगा जब ,
ना हो जन की अवमानना ।
नए साल में करता हूँ मैं
सबकी मंगलकामना
 नूतनता के आँगन में
धूप  की अठखेलियां हों
जैसे इन दिनों
खिल रहा गैंदा
गुलदाउदी
खिले जीवन
सभी का ।
जब मधुमास आये
और हाड कंपाती ठण्ड से
पीछा छूटे ।

जब सबको मिले
वैसा सुख जो अभी
मिलता है
कुछ सागरों -सरोवरों को ।
रेगिस्तान भी हो रससिक्त
खिले हों अनगिनत मरूद्यान
जीवन में । 
नव गति, नव लय, ताल छंद नव
नवल कंठ, नव जल्द मन्द्र रव
नव नभ के नव विहग वृंद को,नव पर नव स्वर दे ।
नव वर्ष २०१४ के लिए  महाप्राण निराला की उक्त काव्योक्तियों  के अनुरूप नवता की कामना के साथ ।

Wednesday, 25 December 2013

 भाषा-माध्यम आदि के सम्बन्ध में अनेक तरह के विचार और तर्क-वितर्क  चलते रहते हैं । मेरी समझ में माध्यम जितने भी हैं , दुधारे का काम करते हैं । माध्यम  में मध्यस्थता रहती है जो किसी को जोड़ने का काम कर सकती है और तोड़ने का भी । जब तक सत्ता चरित्र वर्गीय है तब तक सत्ता -पतियों   के हाथों में  सत्ता-भाषा  की लगाम भी रहती है ।किसी भी माध्यम में 'मध्य' की भूमिका होती है । यही हाल मध्य वर्ग का भी रहता है ,वह सत्ताधीश उच्चवर्ग का सहायक भी हो सकता है और विरोधी भी ।इसलिए भाषा-माध्यम के बारे में कहा जा सकता है कि  भाषा को निर्मित करने वाले समाज की जैसी मानसिकता और कर्म होता है  , भाषा वही रूप ले लेती है  ।
घनघोर अंधेरी रात में,
जब न चांद होता है
न सूरज,
तब दिशा का पता
छोटे-छोटे
चमकते सितारे
देते हैं ।
खुशी की बात है कि  कविता,साहित्य , आलोचना और  कला  के कारकों में लोक-तत्त्व का विस्तार हो रहा है । यह  आज की कलात्मकता  का जरूरी हिस्सा है । यही  लोक-तत्त्व हमारे दैनिक जीवन - व्यवहार का  अंग जब बन जायगा तो मूल धारा की तरह बहने लगेगा । लोक तत्त्व कई जगह फैशन की तरह भी आता है ,जीवन में नहीं होता ।सादगी और साधारणता इसकी प्रकृति का निर्माण करते हैं ।  लोक-तत्त्व की जमीन  हमारे उस लोक-जीवन में है जो किसान-मजदूर की सहज जिंदगी के स्रोतों से उद्भूत होता है ।अब यह रोजगार के दबाव से अपनी जमीन से विस्थापित होकर शहरी रूप भी ले  रहा है ।यह सच है कि   पूरी दुनिया का सञ्चालन श्रम और उससे नाभिनाल-बद्ध शक्तियां ही करती हैं इस वजह से हर युग का बड़ा और कालबद्ध साहित्य इन श्रम -शक्तियों को अपना आधार बनाता है ।

Tuesday, 24 December 2013

ईसा मसीह पड़ौसी से प्रेम करने का सन्देश लगातार देते रहे और उस पर आचरण करके प्रमाण भी प्रस्तुत करते रहे । उनके लिए पड़ौसी का मतलब था कि जो भी आपके आसपास  दुखी है उसके काम आना । दरिद्रता से बड़ा दुःख शायद ही कोई दूसरा हो । आज के युग की  विडम्बना है कि नवउदारवादी आर्थिक नीतियों से कॉर्पोरेट सेकटर को खुली छूट मिलती जा रही है ,जिससे गरीबी और अमीरी के बीच की खाई और चौड़ी होती जा रही है । इस सबसे बड़े दुःख से लड़ने  और उसे दूर करने का जो रास्ता हो सकता है , वही ईसा के अनुसार पड़ौसी से प्रेम की श्रेणी में आ सकता है  ।आज उनका शुभ जन्म दिन है ,उनकी स्मृति को प्रणाम और मैरी क्रिसमस ।