Tuesday, 29 October 2013

अपना घर


यही तो है जो
मुझे तुम्हारे नज़दीक घर नहीं
बनाने देता
यही तो है जो
घर बाद में बनाता है  और
उसकी चहार दीवारी पहले उठाता  है
यह अपना घर ही तो है जो
 हम
 रोज बनाते हैं

यह 'अपना'ही तो है
  जो जिलाता है और
जीने भी नहीं देता
न दूसरों को
 न खुद को

जब तक अपना है
पराया मिट नहीं सकता
अपने को जिसने मिटाया
पराया फिर कोई रहा ही नहीं ।

Sunday, 27 October 2013

जातिवाद का आधार है हमारे कृषि-सम्बन्ध और उंच-नीच वाली वर्ण-व्यवस्था  है  , जिसको कृषि-संबंधों ने  निरंतर गहरा बनाया । जब तक कृषि-सम्बन्ध सही अर्थों में औद्योगिक संबंधों में रूपांतरित नहीं होंगे तब तक रिश्तों का जातिवादी  आधार नहीं खिसकेगा । क्या कारण है कि हमारे यूनीवर्सिटी ---कालेजों तक में यह नहीं टूट पाता ? ट्रेड यूनियन तक  राजनीतिक तौर पर जातिवाद की दलदल में फंस जाती हैं । हमारा सोच तो गैर---जाति परक हो जाता है किन्तु कृषि संबंधों के दबाव उसे फिर से ---पुनर्मूषको भव ---की स्थिति में पंहुचा देते हैं । इसे अंतरजातीय विवाह कुछ ढीला कर सकते हैं किन्तु पितृ-सत्ता उसे फिर अपनी जगह पर ले आती है ।
शम्भू यादव का पहला काव्य-संग्रह ----नया एक आख्यान ---मुझे कुछ समय पहले मिला । धीरे-धीरे पढता रहा । हमारे अलवर का एक छोर हरियाणे से मिला ही नहीं है वरन उस पर उसकी छाप भी है । वह राठ क्षेत्र कहलाता है । एक जमाने में वहां के भोजपुर के भिखारी ठाकुर जैसे लोक-रचनाकार और गायक अलीबख्श ने बड़ी धूम मचाई थी । शम्भू की कविताओं में उनका राठीपन  बोलता है ।  यह शम्भू जी का ठेठ राठी कवि  ही कह सकता है कि ---हमारे आसपास चारों ओर एक ऐसी 'गाद'फ़ैली है जो बदबू तो देती ही है ---बीहड़ भी है । शायद ही गंदगी का ऐसा विशेषण परक बिम्ब कविता में किसी ने दिया हो । गंदगी सच  में बीहड़ ही होती है । उसमें पैर धंसते हैं और निकला नहीं जाता ।यह भौतिक ही नहीं होती , मानसिक उससे ज्यादा होती है । उनकी एक छोटी सी कविता जीवन-अभिप्राय को बहुत दूर तक ले जाती है और शब्द की महिमा को अर्थ के रूप में सचाई के बहुत समीप पंहुचा देती  है ।  आज के इस मूल्य-क्षरण के युग में इतना सटीक बिम्ब वही कवि ला सकता है , जो जिन्दगी के सबसे निचले पायदान से जुड़ा  हो ।जहां से शम्भू जी आते हैं , राठ -हरियाणे  का  वह  इलाका कुछ अलग तरह का है । हमारे यहाँ राठ अंचल के बारे में एक कहावत प्रचलित है ---'-काठ नबै , पर राठ ना नबै' । कुछ ऐसा ही काठीपन शम्भू यादव की कविताओं में है । वे लिखते हैं------"यह कैसी गाद फ़ैली है /बीहड़ और बदबूदार //जहां भी पैर रखो , धंसते हैं / " वे सरल कविताएँ लिखते है लेकिन यह भी सच है कि सरल रेखा खींचना सबसे मुश्किल होता है । उनकी कुछ  व्यंजनाएं  हमारे ह्रदय को विकल कर देने की क्षमता रखती है ------"घर में लडकी जवान है /एक अधूरा लघु-वृत्त /डिब्बे में बंद है / " 

Saturday, 26 October 2013

भूमि सुधार होना ही पर्याप्त नहीं है , उनको लागू करवाना उससे भी कठिन और महत्त्वपूर्ण  कार्य  है । अब तो रीयल एस्टेट वालों ने अपना रिश्ता भूमि से जोड़ लिया है जो अकूत मुनाफ़ा बटोर रहे हैं । हमारे यहाँ के मजदूर संगठन भी खेती के पुराने जातिवादी -सम्प्रदायवादी संस्कारों से ग्रस्त  रहते हैं ।वे आते तो कृषि-क्षेत्रों से ही हैं । शहर में आकर उनका धंधा  बदलता है बिरादरी नहीं बदलती ।  इसलिए हमारे यहाँ  कृषि-संगठन ही सारे संगठनों की बुनियाद ठहरता है । मध्यवर्ग भी उसी के संस्कारों की लपेट में रहता है । रोटी और सुविधाएं तो सभी को चाहिए , जब जीवन में नैतिकता का क्षरण होता है तो पुरानी  काम की चीजें याद आने लगती हैं और व्यक्ति का कमजोर मन चुपचाप , दबे पांव उसके पीछे चलने लगता है । जो नहीं चलता , वह "निराला' हो जाता है ।
आज भी छोटे शहरों और कस्बों में बड़े बड़े जाति - सम्मलेन होते हैं और उनमें अपनी ताकत दिखाकर किसी भी राजनीतिक दल से टिकिट मांगे जाते हैं ।जातियों की कुरीतियों को हटाने और उनमें महिला की   दुस्थिति पर ज्यादा कुछ नहीं होता । इस बात पर तो शायद ही कोई चर्चा होती हो कि एक जाति के भीतर दो जातियां होती हैं । एक जाति का अमीर वर्ग और दूसरा गरीब वर्ग । एक ही जाति के गरीब्वर्ग से गरीब ही रिश्ता करता है उसका अमीर वर्ग अपनी ही जाति के गरीब को अपने से नीची हैसियत का मानकर अपने दरवाजे तक से दूर रखता है । किन्तु   जाति  का मनोवैज्ञानिक और  सामाजिक बंधन इतना जटिल है कि वह नौकरी  लगाने , ट्रान्सफर कराने , कोर्ट कचहरी का काम कराने और इसी तरह की धंधों से जुडी बातों में जन दबे-छुपे नज़र आता है तो उसकी विविध रंगों भरी भूमिका को मानना पड़ता है । भले वह सच न हो , वास्तविकता तो है ।आजकल जाति -सम्प्रदाय  राजीतिक मोर्चे पर सबसे प्रभावी हैजहां से सत्ता के स्रोत निकलते हैं । सत्ता के खेल से कौन बचा है क्योंकि जीवन में हरेक का कोई न कोई काम मौजूद है । खुद का नहीं है तो बेटे बेटियों का है , दोस्तों का है । कोई न कोई हथकंडा अपनाए बिना इस व्यवस्था में केवल नैतिकता के आधार पर शायद ही किसी का कोई काम हो ।  अभी कुछ दिन बाद ही  अखबारों में पढ़ लेना जब विधान सभा- क्षेत्रों के अनुसार  अखबार जाति -मतदाताओं की संख्या जारी करेंगे ।जाति और सम्प्रदाय विकट  पहेली है । पूंजीवादी व्यवस्था आने पर यह हटनी चाहिए थी लेकिन कृषि-प्रधान अर्थ व्यवस्था के चलते हमारे जैसे देशों में पूंजी और सामंती प्रवृतियों का गठजोड़ हुआ  इसलिए हमारे  यहाँ जाति -सम्प्रदाय आर्थिक -राजनीतिक प्रक्रियाओं  में भी संगठनकारी  भूमिका निभाते हैं । यदि कृषि का सही मायने में औद्योगीकरण  होता तो यहाँ  भी जाति -वर्ण-सम्प्रदाय की चूलें ढीली होती । कहने का मतलब यह है कि आज तक भी हमारे कृषि-सम्बन्ध नहीं बदले हैं । १ ८ ९ ४ का अंग्रेजों द्वारा बनाया हुआ ---भूमि अधिग्रहण क़ानून -----आज तक चला हुआ आ रहा था । उसकी जगह २ ० १ ३ में नया क़ानून आया है । कृषि-जीवन की उपेक्षा सर्वत्र है   । 

Friday, 25 October 2013

यह दरअसल हमारे बुनियादी खेतिहर जीवन की समस्या है । पेड़ की जड़ें आज भी कृषि-प्रधान ग्रामीण जीवन में हैं , जहाँ आज सबसे ज्यादा गरीबी की मार है । उन्ही संस्कारों से जब कोई व्यक्ति पढ़-लिखकर या किसी अन्य धंधे के  लिए नगर या महानगर में आता है तो बुनियाद में बसे संस्कारों को नहीं छोड़ पाता  । एक जाति  में पैदा होता है , उसी में ब्याहता है , उसी खोल में नौकरी प्राप्त करता है , बाल-बच्चे भी उसी माहौल में पैदा होते हैं , स्कूल-कालेज भी जाति  को याद कराते हैं फिर आ जाती है राजनीति , ये भी उसी की याद दिलाती  हैं , मीडिया के समीकरण और चिंताएं भी वही । फिर बदलाव आए कहाँ से । और कौन लाए । सब आसान  रास्तों पर चलना चाहते हैं । कबीर ने खूब कहा कि ---जाति  न पूछो साधू की ---पर कुछ हुआ । इस कान से सुना  और उस कान से निकाल दिया । थोड़ी-बहुत सुरक्षा मिली तो जाति के घेरे में ही मिली । यह ऐसी हकीकत है जिससे कैसे निपटा जाए , यह सवाल हमेशा बना रहता है ?
साहित्य में अपनी जिन्दगी तक सीमित रहने के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उसकी सीमाएं होती हैं । इसीलिये वहाँ अनुभववाद की जो सीमाएं होती हैं , आए बिना नहीं रहती । निराला , प्रेम चंद अपने भोगे तक ही सीमित रहते , तो बड़ी रचना ----कालजयी -----शायद ही कर पाते । व्यक्ति में यह क्षमता है कि जैसे वह अपने ज्ञान का विस्तार कर लेता है वैसे ही वह अपना अनुभव और  दृष्टि-विस्तार भी करता है ,जो उसके संवेदना जगत को दूर दूर तक फैला देते  है । लिखता तो हर व्यक्ति ही अपने अनुभव की बात है , किन्तु वह वहीं तक सीमित होकर नहीं रह जाता । संकोच और विस्तार के  वैरुद्धिक सामंजस्य की कला है साहित्य ।