Monday, 9 January 2012

हमें जानना होगा  कि यह समय उत्तर-आधुनिक है जिसमें  'औद्योगिक पूंजी' की बड़ी भूमिका  नहीं रह गयी है | सर्वत्र 'आवारा पूंजी' मारीच के कंचन -मृग की तरह विचरण कर रही है |सारा खेल उसी का है | बाज़ार -तन्त्र  विखंडन-लीला में लगा हुआ है |,ज्ञानोदय और प्रबोधन की भूमिकाएं नगण्य हो गयी हैं |मीडिया से जागरूकता को विखंडित और अपदस्थ करने में मीडिया-प्रबंधक सफल हो गया है और उसकी लगाम अपने हाथ में ले ली है | पत्रकार की सापेक्ष स्वायत्तता का चीर-हरण हो चुका है |अत छोटी छोटी जगहों से लघु-पत्रकारिता के वैकल्पिक लोकतांत्रिक तन्त्र को विकसित करने की जरूरत है |जैसे स्वाधीनता आन्दोलन के दिनों में देशी भाषाओं में औपनिवेशिक तन्त्र विरोधी पत्रकारिता उद्भूत एवं विकसित हुई थी |पत्रकारिता की एक देशभक्तिपूर्ण परम्परा हमारे यहाँ रही है ,उससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है लेकिन वह त्याग की मांग करती है |अध्ययनशीलता और त्याग-वृत्ति ही रास्ता दिखला सकती हैं |

Sunday, 8 January 2012

पहली बात यह समझनी होगी कि  शिक्षा के साथ उसका पूरा तन्त्र होता है और उसके ऊपर सत्ता -धारी शासक वर्ग का नियन्त्रण होता है | शिक्षक वर्ग उसकी नौकरी करता है |उसकी स्वतन्त्रता बस इतनी सी होती है  कि वह कक्षा में अपनी दृष्टि से पढ़ा सकता है किन्तु कितने अध्यापक होते हैं जो अपने समकाल और लोक-जीवन से दृष्टि प्राप्त  करके अध्ययन -अध्यापन में रत रहते हैं |अत; पहली जरूरत स्वयम अध्यापक को बदलने और निरंतर बदलने की प्रक्रिया में बने रहने की होती है |अन्यथा जिस शासन की हम नौकरी बजाते हैं वह कभी बुनियादी परिवर्तन के लिए तैयार नहीं होता | बदलाव के लिए , मिली हुई सुविधाओं को छोड़ना पड़ता है |हर युग में व्यक्ति अपने समय के यथास्थितिवादी तन्त्र का तब तक गुलाम बना रहता है ,जब तक कि  वह समय के यथार्थ को उसकी पूर्णता एवं समग्रता में न समझ ले |संगठित एवं समूहबद्ध होकर लगातार प्रयत्न करने की जरूरत है ,इसी प्रक्रिया से रास्ता निकलता है |

Saturday, 7 January 2012

हँस  रही
खिलखिलाकर
पूस की ठिठुरती
धूप में
गुलदाउदी
इन दिनों |

वल्कल-वसना
वनवासिनी
तन्वी
शकुन्तला
अठखेलियाँ  करती
सखियों संग
जैसे |

निहारता हूँ
जब-जब
आते-जाते
खिल उठते
फूल
मन में
दाउदी के |

गुलदाउदी

हँस  रही
खिलखिलाकर
पूस की ठिठुरती
धूप में
गुलदाउदी
इन दिनों |

वल्कल-वसना
वनवासिनी
तन्वी
शकुन्तला
अठखेलियाँ  करती
सखियों संग
जैसे |

निहारता हूँ
जब-जब
आते-जाते
खिल उठते
फूल
मन में
दाउदी के |

 निर्मला पुतुल की कविता की खूबी है ,उसकी वह भाव-भूमि ,जो मध्यवर्गीय जीवनानुभवों का अतिक्रमण करने से बनती है इसलिए उनकी कविताओं से जो सवाल निकल कर आते हैं वे मध्यवर्गीय सीमा-बद्ध  लोगों को निरुत्तर कर देते हैं |उनके शिल्प में कोई अतिरिक्त सजगता नहीं है |उनका शिल्प अंतर्वस्तु  से स्वत-स्फूर्त ढंग से निकलता है |वे सहज ही नहीं ,सजग भी हैंउनके पास अनुभवों का विलक्षण कोश  मौजूद है | कविता पहले से पढ़ता रहा हूँ और उनके पहले कविता-संग्रह की समीक्षा भी ,जब वह प्रकाशित हुआ था, तभी कर चुका हूँ | इस तरह की लोकधर्मी कविता हमारी निराशा को दूर करती हुई उस आसमान की और इशारा भी करती है ,जिसमें आज भी निर्मलता बाकी है |

समय



कितना -कितना
समयहीन
समय ,
गायब  नाक-नक्श
चेहराविहीन |

सूरज की किरण
तमपाश में
मधुयामिनी
         पुलकित
रासक्रीडामें व्यस्त
समय का दार्शनिक
भूलभुलैयों में |

महलों की
मुंडेरों को छूने की
होड़ सर्वत्र
राजनेता,सर्वोच्च शिक्षाविद
पत्रकार ,सम्पादक ,लेखक
कलाकार
गलियों-राजमार्गों पर
खड़े
पांत-दर पांत
ताकते
समयशून्य  समय को |

Friday, 6 January 2012

माँ

 हृदय-सिन्धु
माँ
सबसे बड़ी कविता
पृथ्वी पर |

हिमगिरि- हृदय
माँ
सबसे बड़ी कविता
धरती पर |

हृदय-गगन
माँ
सबसे बड़ी कविता 
वसुंधरा पर |

पृथ्वी
सबसे बड़ी कविता
या
माँ  |