Wednesday, 19 September 2012

कलाकार चरण शर्मा की नाथद्वारा से मुम्बई तक की कलायात्रा से परिचित कराने के लिए धन्यवाद |इसमें श्री नाथ जी से महात्मा बुद्ध तक की उनकी यात्रा जैसे आसमान से धरती पर उतरने की यात्रा भी है |यह एक कलाकार के विकास और बदलाव को भी सूचित करती है |यह उनके भाव-वाद से यथार्थवाद की यात्रा भी है |नाथद्वारा के पास वाली नदी के पत्थर इस कला यात्रा की अपनी विशेषता कही जा सकती है |प्रसन्न होंगे |
आदरणीय भाई ,
आपकी विस्तृत ई -मेल पाकर खुशी हुई |आपने जो कहा है ,वह पूरी तरह सच है |मैं समझता हूँ इसका कारण वह मध्यवर्गीय चरित्र है जो एक ओर वामपंथी राजनीति को प्रभावित करता है तो दूसरी तरफ साहित्य,कला और संस्कृति को |मध्यवर्ग सब कुछ अपनी सुविधा से करना चाहता है |इसलिए बुर्जुआ तंत्र के जाल में फंस जाता है |आखिर जीवन ओर अस्तित्व की जो सुख -सुविधा बुर्जुआ तंत्र के साथ रहने पर मिलती हैं वह गरीबों की राजनीति के साथ रहने पर कैसे मिल सकती है |हमने देखा है कि आजादी मिलने से पहले जो कम्युनिस्ट कवि कहलाते और समझे जाते थे वे बाद में कैसी पलटी मार गए | कविता और आलोचना दोनों के भीतर ऐसा चारित्रिक गड़बड़झाला बहुत चलता है |नामवर जी और उनकी मंडली के साथ यही है | वामपंथ का रास्ता काँटों पर चलने वाला रास्ता है ,जिसमें भारी उपेक्षा सहनी पड़ती है और अटूट संघर्ष करना पड़ता है |रचनाकारों की पूरी की पूरी जमात है जो पुरस्कारों , सम्मानों और कैरियर-उत्थान के लिए इस धंधे में आती है | यशसे, अर्थकृते से आगे की सोचकर जो लिखेगा ,वही बड़े जीवन-संघर्ष के लिए तैयार होगा |सोवियत संघ के विघटन के बाद अवसरवाद की बाढ़ तेजी से आई ,जिसका प्रभाव आज सभी क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है |आलोचना-लेखन में तो अवसरवाद की गुंजाइश ज्यादा रहती है |इस विधा में मिलावट की गुंजाइश इसे कैरियर का आधार बना लेने से और बढ़ जाती है |कितने ही उदाहरण हैं जब किसी बड़े अधिकारी की मिथ्या प्रशंसा करके लोगों ने ऊंचे-ऊंचे पद हथिया लिए हैं |आलोचना में व्यक्ति की चारण-वृत्ति को अवकाश ज्यादा रहता है |वह रचना पर आश्रित रहने से मूर्ख को ही विद्वान घोषित कर सकती है | खराब आलोचना का उदाहरण बने तो उसकी बला से |लेखक का जीवनतो सफल हो ही जाता है |लेकिन इसी में रास्ता निकलता है और देर से ही सही अच्छे -बुरे की पहचान होती ही है |आशा की कोई किरण यहीं है | प्रसन्न होंगे | अभिवादन सहित |
आपका -----जीवन सिंह

Wednesday, 5 September 2012

अनीता जी वे उच्च शिक्षित तो हैं ,लेकिन उनकी शिक्षा ने उनको अभी उच्च 'मानव ' नहीं बनाया है .वे अफसर हो सकते हैं |एक बात और है कि इनके पास भी अनेक रास्तों से अतिरिक्त धन----बिना खून पसीना बहाए , |आता रहता है |जहाँ भी जिसके पास अतिरिक्त धन आयेगा उसका यही चरित्र बन जायेगा |हाँ कुछ जीवित और जागृत आत्मा वाले मनुष्य इससे आत्मसंघर्ष करते हुए इससे निजात पाने की कोशिश करते हैं |निम्न मध्यवर्ग अक्सर विचार-प्रक्रिया में इन बातों को समझ लेताहै तो वह अपने स्वभाव को मेहनतकश वर्ग के पक्ष में बदलने की कोशिश करता है वह अपनी आत्मा के घायल पक्षी का उपचार कर लेता है | |पूंजी की व्यवस्था में हरेक व्यक्ति अपने वर्ग-स्वभाव के अनुसार व्यवहार करता है |ऊंची शिक्षा तो ऊंचे पद पाने के लिए लेता है ताकि जिन्दगी भर अतिरिक्त धन के लिए इंतजाम हो जाए |आज मध्य वर्ग के पास भी अतिरिक्त धन के कई स्रोत बन गए हैं , जिससे उनकी आत्मा का प्रकाश ख़त्म हो जाता है और वे सदैव एक आत्म रिक्त जिन्दगी जीकर 'खुश'रहते हैं |उनको फिर किसी की परवाह नहीं रहती |वे उसी वर्ग का साथ देते हैं जो अतिरिक्त धन जुटाने में उनकी मदद करता है |
खरे जी की बातों में दम है और बात को कहने का सलीका उनको आता है ,| हाँ , यह सही है कि कई बार उनकी भाषा में रौद्र भाव कुछ ज्यादा आ जाता है |यह सच कहने का दबाव भी हो सकता है |यदि सच कहने में क्रोध न आए तो सच भोंतरा होकर अपना प्रभाव खो देता है |फिर बात को कहने की अपनी शैली भी होती है |यह उनको तो बुरा लगेगा ही जो कान्हा में कविता और रासलीला का समन्वय कर रहे थे |हम मुक्तिबोध का नाम खूब लेते हैं किन्तु उनसे कुछ सीखते नहीं |मुक्तिबोध ने एक ज़माने के वामपंथी माने जाने वाले लोगों में जब देश को आजादी मिलने के बाद अवसरवाद की बाढ़ आई तो तो वे अपने एक ज़माने के साथी मित्र कवियों के इस अवसरवादी व्यवहार के प्रति अपनी खिन्नता और क्षोभ लिख कर प्रकट किया | उन्होंने अपनी समीक्षाओं और कविताओं में "कवि -चरित्र " को लेकर खूब लिखा है | आज तो इसकी बाढ़ सी आई हुई है |वामपंथ केवल विचारधारा ही नहीं होता बल्कि वामपंथी चरित्र भी होता है |खरे जी ने भीतर तक जाकर उसका उदघाटन करके बहुत अच्छा किया है |अंतर्वस्तु और उसकी शैली तथा सच कहने के साहस के लिए उनको दाद दिए बिना मन नहीं रहता |

Monday, 3 September 2012

इस बियाबान में --------
इस बियाबान में
मैंने देखा----
जंगली कुत्ते घेर खड़े हैं
धूल धूसरित
भूखा प्यासा फटेहाल
सच्चे मानव राहगीर को
दीप्यमान ईमान चन्द्र को
ग्रहण लगे ज्यों
मैंने देखे ------
खींच-खींच कर अंतड़ियों को
आत्मा की '
सेंक रहे --चूल्हे भट्टी में |
इस बियाबान में
काले नाग ,नागिने काली
फूत्कार से डरा डरा कर
डरे हुए स्वार्थी कीटों की
बड़ी जमातें जुडती जाती
सोपानों सी
नागों का विषदंत पुराना
खुश होकर अमृत दिवस मनाती
खुश करती नागों को
नाग सभ्यता बढ़ती जाती
वृक्ष विषैले उगते जाते
घुसते सांप पराये बिल में
चूहों की कमबख्ती आती
यही दिखाई देता
लिखा हुआ महलों दुर्गों में
इस निजाम में
रिश्ता लाठी भेंस का बनता
बड़ी बड़ी मछली छोटी को खाती
जंगल का सिद्धांत पुराना
अब भी चलता |


































खिली धूप में
कार सड़क पर
दौड़ी जाती है
पीं-पीं,पीं पीं
पीं पीं- पीं पीं
सभी जगह पर
करते करते
अपना रौब जमाती है |
खिली धूप में
खुली सड़क पर
बस भी आती है
पों पों पों पों
पों पों पों पों
करते करते
सभी जगह पर
अपना रौब दिखाती है
खिली धूप में
अपने पथ पर
रेल भी आती है
छुक छुक छुक छुक
छुक छुक छुक छुक
करते करते
अपनी खुशी जताती है |
खिली धूप में
वायुयान भी
आसमान में उड़ता है
जम जम जम जम
जम जम जम जम
करते करते
ऐंठ अकड़ता है |





































खिली धूप में
कार सड़क पर
दौड़ी जाती है
पीं-पीं,पीं पीं
पीं पीं- पीं पीं
सभी जगह पर
करते करते
अपना रौब जमाती है |
खिली धूप में
खुली सड़क पर
बस भी आती है
पों पों पों पों
पों पों पों पों
करते करते
सभी जगह पर
अपना रौब दिखाती है
खिली धूप में
अपने पथ पर
रेल भी आती है
छुक छुक छुक छुक
छुक छुक छुक छुक
करते करते
अपनी खुशी जताती है |
खिली धूप में
वायुयान भी
आसमान में उड़ता है
जम जम जम जम
जम जम जम जम
करते करते
ऐंठ अकड़ता है |