Thursday, 27 September 2012

आदरणीय भाई ,
आपका ई-पत्र |आपने सही कहा है कि यह बहुपक्षीय लड़ाई है |वर्ग-शत्रुओं से तो है ही ,उन आस्तीन के साँपों से भी है जो बात तो सुधा की करते हैं ,लेकिन परिणाम देते हैं विष का | जो लोक को मानते हैं उनको भी और गहरे में उतरने की जरूरत है और यह तभी संभव है जब कि जीवनानुभवों को व्यापक बनाते रहा जाय तथा विचारधारा की रोशनी को तेज किया जाय |एक बार के प्राप्त अनुभवों से जिन्दगी भर काम नहीं चल सकता जब कि चीजें बहुत तेजी से बदल रही हैं |सोवियत संघ के विघटन और उत्तर-आधुनिकता के विमर्श प्रचार ने विचारधारा के काम में गहरी सेंध लगाई है |मध्यवर्गीय आकांक्षाओं ने इसमें पलीता लगाने तथा प्रलेस -जलेस के नेतृत्व की दिग्भ्रम स्थिति ने भटकाव पैदा किया है |बहरहाल, जो सच है ,वह तो है ही |ऐसी स्थितियों में भी जब यह सुनने को मिलता है कि राजेश्वर सक्सेना साहब ने छत्तीसगढ़ सरकार का दो लाख का पुरस्कार अपने जीवन- मूल्यों के चलते ठुकरा दिया ,तो हौसला आफजाई होती है कि पृथ्वी वीर-विहीन नहीं है |प्रसन्न होंगे |---आपका ----जीवन सिंह

Tuesday, 25 September 2012

आदरणीय भाई ,आपका ई-पत्र | दरअसल यह बड़ी लड़ाई है ,जो साहित्य के साथ-साथ जीवन के मोर्चे पर भी है |कलावाद में आसानी ही यह होती है कि व्यक्ति जीवन के संघर्षों से बच जाता है |बुजुआ वर्ग के मुआफिक कलावाद ही पड़ता है |यह उसी की विश्व -दृष्टि की उपज है| विडम्बना यह है कि इसमें वे लोग भी फंस जाते हैं जो जनवादी विश्व -दृष्टि के पक्षधर बनते हैं |अपनी परम्परा से विच्छेद होना भी इसकी एक वजह है |ऐसा लग रहा है जैसे रमाकांत जी अभी पूरी तरह से उबर नहीं पाए हैं | अन्यथा आपके फोन का तो जवाब देते ही |आप भी जयपुर नवम्बर तक पहुचेंगे या इससे पहले |सभी प्रसन्न होंगे | आदर सहित ----आपका ---जीवन सिंह

Monday, 24 September 2012

आदरणीय भाई ,
आपका इ-पत्र | सच तो यह है कि चरित्र का संकट हर युग में रहा है |लोग ताकत के पक्ष में बदलते देर नहीं लगाते |कमजोर की ताकत को तो मार्क्सवाद ही दिखाता है |लेकिन यह तभी हो पाता है जब कि गहरी संवेदनशीलता और मूल्य-भावना व्यक्ति के मन और व्यवहार दोनों में हो |किताबी संवेदनशीलता का इज़हार तो कविताओं में खूब दिखाई पड़ता है किन्तु वह गहराई में उतरने से डरता है |वहाँ गुमनामी का ख़तरा नज़र आता है या फिर उसे निराला जी की तरह 'विक्षिप्त 'घोषित किये जाने का अभिशाप झेलने के लिए तैयार रहना पड़ता है |मीठी -मीठी गप्प और कडवी-कडवी थू करने से तो यहाँ काम चलता नहीं |यहाँ तो हर घड़ी परीक्षा का है | देखा जाय तो दुनियादारी के लिहाज से तो इस रास्ते पर चलने वाले को कडवे और कषैले स्वादों के लिए ही तैयार रहना चाहिए |यह प्रेम का घर है खाला का घर नहीं | हम जैसे को तो हमारी धारा --जनवाद ---में ही तिरस्कार भाव से देखा आता है और केवल ध्वंस की आलोचना लिखने वाले के खाते में डाल दिया जाता है |जनवाद में भी हमारा जनवाद --लोक की तरफ झुका होने से 'मध्यवर्गीय जनवादियों को रास नहीं आता ,न भाषा,न शिल्प,न मुहावरा , न प्रतीक-बिम्ब -रूपक, |उनको सब गंवारू और पिछड़ा हुआ लगता है जैसे कुलीनों और सामंतों को लगता रहा है | जबतक लोग अभावग्रस्त रहते हैं या पद-हीन या उपेक्षित ,तब तक फिर भी जनवाद का झंडा उठाए दीखते हैं लेकिन जैसे ही बुर्जुआ सिस्टम में कुछ पा जाते हैं वैसे ही कविता और सिद्धांत दोनों को ही आँख दिखाने लगते हैं |भरोसे की कसौटी पर खरा उतरना बहुत मुश्किल होता है |चौराहा मिलते ही राह बदलने में संकोच तक नहीं करते |ऐसे माहौल में नामवर-परम्परा को आगे बने रहने का मौक़ा मिल जाता है | अभी एक जगह मैनेजर पाण्डेय ने लोक और जन की तुलना करते हुए लोक को अमूर्त के खाते में डाल कर इसको सरकारी शब्द बतलाया और इसके समक्ष जन की हिमायत की |यह उन्होंने जनतंत्र का सच पर भाषण देते हुए कहा |यह एक ब्लॉग में पढ़ा |बहरहाल , मैंने अपने मन की बातें कहीं हैं जो मैं इन दिनों सोचता रहता हूँ |सभी प्रसन्न होंगे ----आदर सहित ------आपका ----जीवन सिंह
पुनश्च ---मैंने 'पहली बार , में पढ़ लिया है |लीक से हट कर है |बहुत अच्छा लगा |

Sunday, 23 September 2012

आदरणीय भाई ,आपका ई-पत्र|डाउनलोड की प्रक्रिया से निकालकर आलेखों को पढूंगा और उसके बाद आपको लिखूंगा |निस्संदेह ,प्रगतिशील और जनवादी धारा के लिए पुनर्जागरण की बड़ी आवश्यकता है |उत्तर-आधुनिकतावाद की नयी परिस्थितियों ने 'मध्य-वर्ग' की धन और यश की लिप्सा को बेकाबू सा कर दिया है |लोगों को मानवता का भविष्य इसके अलावा कुछ दिखाई ही नहीं देता |सभी कुछ का अंत कर देने की घोषणा एक जमाने के मार्क्सवादी रहे लोगों तक ने कर दी या फिर चुपचाप इनको सिर-माथे लगाकर यह मान लिया कि ज्यादा कुछ होने- जाने वाला नहीं है | कुछ लोगों ने वर्ग-विमर्श को त्याग कर ,दलित और स्त्री-विमर्श का सुरक्षित रास्ता निकाल लिया है जिसमें उच्च-मध्यवर्ग को भी जगह मिल जाती है | सत्ता से सम्बन्ध बने रहने के सारे सूत्र मध्य-वर्ग वैसे ही निकाल लेता है जैसे पानी नीचे बहने का |बहरहाल, संघर्ष के अलावा कोई रास्ता है ही नहीं |
राजनीतिक पक्ष में में भी एक तरह का अवसरवाद ही नज़र आता है | अपनी जगह तो तब बनती जब हिंदी -क्षेत्रों में वामपंथ को रास्ता मिलता |इस जगह को धुर दक्षिणपंथ घेरे हुए है |कांग्रेस भी येन-केन प्रकारेण अपनी सत्ता को बरकरार रखने के रास्ते को ही अपना रास्ता मान चुकी है |इसलिए बड़ी जरूरत तो जन-जागरण की है |देश के मेहनतकश वर्ग की सैद्धांतिक एकजुटता की ----जातिवाद मुक्त किसान एकजुटता की |सबसे बड़ी बात है वर्ग-चेतना की |मध्य-वर्ग द्वारा डी-क्लास करने की ,व्यापक-स्तरीय संवेदनशीलता की |जिससे एक सही राजनीतिक विकल्प तैयार हो |
मैं पढ़ते हुए देख रहा हूँ कि यूरोप और अमरीकी समाजों के नए साहित्य और नयी धारणाओं से हमारा काम नहीं चल सकता |वह तो फिर हमारी मान्यताओं का उपनिवेशीकरण हो जाएगा |हमको हमारा रास्ता स्वयं ही बनाना होगा |हमारे पास एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है |हमारी अपनी देशज जमीन है |हमारा अपना ,परिवेश प्रकृति और सम्बन्ध-भावना है |नकलें ज्ञान -विज्ञान और शास्त्र के स्तर पर की जा सकती हैं |क़ानून -राजनीति,शासन-प्रशासन पराई भाषाओं में चलाया जा सकता है लेकिन साहित्य -संस्कृति ऐसे क्षेत्र हैं जहां किसी तरह का घालमेल नहीं चल सकता |आप वैचारिक मदद ले सकते हैं ,अपनी खिड़की खुली रखकर बाहर की हवाओं और प्रकाश को आने दे सकते हैं क्योंकि मानवता की लड़ाई पूरी दुनिया में चली है |मानवता के सन्दर्भ में कुछ सीखने को मिल जाय ,इतना सा उद्देश्य रहता है बस इस साहित्य को पढ़ते हुए |प्रसन्न होंगे |----आपका जीवन सिंह

Friday, 21 September 2012

आदरणीय भाई , आपका आलेख मिला तो था लेकिन वह करप्ट हो जाने से पढने के लायक नहीं रहा |उसकी लिपि बदल गयी |निकाल कर देखा तो वह हाऊ-बिलाऊ बन गया |आपको अंगरेजी में सुविधा है तो उसी में लिखियेगा ,कोई बात नहीं |मुझे देवनागरी में दिक्कत नहीं है |अंगरेजी में मैं स्वयं को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाता|इसलिए मैंने यह रास्ता अपनाया |आप अपनी सुविधा से लिखें |आपकी बातों को तो मैं समझ लेता ही हूँ |यहाँ पुस्तकालय में रोज दो घंटे जाता हूँ |शेक्सपीयर ,कीट्स ,जेन ऑस्टेन ,हार्डी, डिकेंस ,हेमिंग्वे और अंगरेजी भाषा पर नियमित पढ़ रहा हूँ और अपनी डायरी में भी लिख रहा हूँ |पौत्र अभिज्ञान को उसके शिशु घर में छोड़ने जाता हूँ |रेल का रास्ता है |कुछ दूरी पर सागर-तट है ,वहाँ चला जाता हूँ |प्रशांत महासागर का एक किनारा |आष्ट्रेलिया के ६०हज़ार वर्ष पुराने आदिवासियों पर भी यहाँ अंगरेजी में काफी साहित्य है ,जो हमारी परम्पराओं से बहुत मिलता-जुलता है |आश्त्रेलियन अंगरेजी में इन आदिवासी बोलियों के शब्दों को भी ले लिया है |यहाँ कई सब्बर्बों के नाम आदिवासी बोलियों पर हैं |यहाँ की वनस्पति , फूलों और बीहड़ों नदियों पर भी कई नाम हैं | बेहद प्रकृति-प्रेमी समाज है |सभी स्थान तरु -आच्छादित हैं |नदी-तटों को नेशनल पार्कों में बदल दिया है |आरम्भ में १८-वीं सदी के अंत में जो लोग यहाँ पहली बार आये थे ,उनमें कुछ लोग ऐसे भी थे जो चाहते थे कि कुछ संग्यावाची शब्दों को यहाँ की मूल भाषाओं में ही रखें |भाषा के विकास की दृष्टि से यह अद्भुत स्थान है , जहाँ दुनिया के हर कोने का नागरिक रहता है |यह मात्र २०० साल पुराना देश है ,लेकिन इनको अंगरेजी और लैटिन की लम्बी विरासत की समृद्धि प्राप्त है |रेसिज्म की भावना है तो सही लेकिन बहुत कम है |दूसरों को बर्दास्त करने वाले बहुमत में हैं |वैसे तो ये अंग्रेज हैं और अपने ज्ञान-विज्ञान -साहित्य पर पूरा गर्व करते हैं _ इनको यह भी अहसास है कि इनकी भाषा- संस्कृति का इस समय पूरी दुनिया में डंका बज रहा है |पुस्तकालयों में लोग खूब बैठते हैं |रेलों में भी पढ़ते हुए अपना समय बिताते हैं |बहरहाल ,लेखों की लिपि यदि बदल सके तो भेज दीजियेगा |भाभी जी से प्रणाम कहियेगा ,अन्य सभी को स्नेह |प्रसन्न होंगे |----------आपका ------जीवन सिंह

Thursday, 20 September 2012

आदरणीय भाई ,
आपका हिंदी में मेल पाकर बहुत अच्छा लगा |मुझे भी यद्यपि यह विद्या बहुत अच्छी तरह नहीं आती पर काम चला लेता हूँ |आपका स्वागत है |तकनीक ने पत्र-लेखन की विधा को यह नया आयाम दे दिया है |न कागज बीच में न डाकिया , न चिट्ठी खोने का झंझट और न ही लंबा इंतज़ार |देश की सीमाओं का अतिक्रमण |अन्यथा सिडनी और फरीदाबाद कैसे इतने नज़दीक हो पाते |कभी पूरी वसुधा ऐसे ही एक हो जायेगी |देश ,प्रान्तों की जगह ले लेंगे |विश्व की कोई एक केन्द्रीय सरकार होगी |समाजवाद का सपना ऐसे ही पूरा होगा |------भाभी जी को प्रणाम कहिएगा ,एनी सभी को प्यार |-----आपका ------जीवन सिंह

Wednesday, 19 September 2012

आदरणीय भाई ,
आपका ई-मेल |मैंने दरअसल जो बात उठाई थी वह आलोचना के प्रसंग में थी |आलोचना -लेखन में आचरण-पतित होने का ख़तरा ज्यादा रहता है |यद्यपि यह ख़तरा आता कविता की तरफ से ही है |ख़राब कवितायेँ ख़राब आलोचना को जन्म देती हैं |जैसे एक कवि को व्यक्तित्व -साधना की जरूरत होती है वैसे ही आलोचक को भी |नामवर जी के साथ यही तो हुआ ,कि वे अपने रास्ते को छोड़ कर उसी रास्ते पर चल पड़े ,जिस पर अवसरवादी चलता है |ऐसा आलोचक ज्यादा नुकसान पहुँचाता है जिसकी छवि और कर्म में गंभीर फांक हो |नामवर जी को जब लगा कि कम्युनिस्ट आन्दोलन से कुछ ज्यादा बनने वाला नहीं है तो फिर 'राम ' को छोड़कर माया ही क्यों न बटोरी जाय |कम्युनिस्ट पार्टी से वे एम् .पी का चुनाव जब हार गए तो उनको अपना भविष्य अंधकारमय नज़र आने लगा होगा कि ऐसे तो कहीं के भी नहीं रहेंगे |उस समय सत्ता से अंदरूनी सम्बन्ध बनाए रखने वाले कई कवि-साहित्यकार थे ही |और उधर नयी कविता ,नयी कहानी और नयी समीक्षा की हवा बह रही थी ,उसी के साथ हो लिए |नागार्जुन,केदार और त्रिलोचन के पास कविता तो थी ,पर सत्ता नहीं |सत्ता के नज़दीक थे रघुवीर सहाय ,श्रीकांत वर्मा आदि |एक रास्ता निकल आया ,आलोचना बुद्धि काम आयी |दूसरा कोई ऐसा था नहीं ,जो हवा बदल देता क्योंकि आलोचना- कर्म यदि ईमानदारी से किया जाय तो कम कठिन नहीं होता |कविता की अमूर्तन कला में बहुत कुछ छिपा रह जाता है |आलोचना में बात छिप नहीं सकती |नाक की सीध में चलना पड़ता है |रूपवादी आलोचना को भी कोई ख़तरा नहीं रहता |इसलिए ज्यादातर लोग कविता के रूप के बारे में आधी अधूरी बातें करके आलोचना-कर्म की इतिश्री कर देते हैं | आजकल तो ''लोक ' का भी एक रूपवादी नक्शा बना लिया गया है |कुछ कवियों के पास तो दोनों तरह का माल है जिसको जैसी जरूरत हो ,ले ले |बहरहाल ,चुनौती और संघर्ष के ये ही मोर्चे हैं ,जिन पर लम्बी लड़ाई चलने की संभावना है | प्रसन्न होंगे |घर में सभी को यथा-योग्य अभिवादन |-----------आपका ------जीवन सिंह