Thursday, 11 October 2012

आदरणीय भाई ,आगे इस सम्बन्ध में जो प्रगति हो उससे अवगत कराना |कामेश्वर जी आपके निर्देशन में गाडी को खींच सकते हैं |सुविधा की बात यह भी तो है कि वे जयपुर की जयपुर में हैं और अब सेवा-मुक्त भी हो गए हैं |घर के दायित्व भी शायद सीमित हैं |बेटे की नौकरी से प्रसन्न हैं | उनकी इच्छा भी है |सामग्री आपको जुटानी होगी और सम्पादकीय पहले की तरह लिखते रहना होगा |बाद में कामेश्वर जी अनुभवी हो जायेंगे तब वे और दायित्त्व बटा लेंगे |भाभी जी को प्रणाम |आपका -------जीवन सिंह

Wednesday, 10 October 2012

आदरणीय भाई ,रमाकांत जी को न कहने में बड़ा जोर आयगा |उन्होंने जिस वृक्ष के मधुर फलों का अमृत- आस्वादन कर लिया है उस वृक्ष की छाया को वे आसानी से कैसे छोड़ेंगे |कृति-ओर के सम्पादन ने उनकी ख्याति को जैसे पंख लगा दिए , यह बात वे अच्छी तरह से जानते हैं |इससे पहले राजस्थान से बाहर कितने लोग जानते थे ? मुझे भी लगता है वे अवसाद से अब जल्दी उबर जायेंगे काफी समय हो चुका है |थोड़ा इंतज़ार और कर लीजिये |एकाध बार स्वास्थ्य के बहाने पूछ भी लीजिये |संभव हो तो ,कामेश्वर जी को भेज भी दीजिये ,किन्तु तभी जब उनकी तरफ से कोई संकेत मिले अन्यथा कामेश्वर जी को अच्छा नहीं लगेगा |बहरहाल ,कोई रास्ता अवश्य निकलेगा |अब पूंजीवादी व्यवस्था के साहित्य-संस्थान केवल पूंजी के चाकर बन कर रह गए हैं ,उनकी अध्यक्षता करना भी पूंजी की हाजिरी बजाना ही है |आपने वेद व्यास को मना कर दिया ,अच्छा किया |पूंजी की प्रगतिशीलता का मानवीय चेहरा अब साम्राज्यवाद ने क्षत-विक्षत कर दिया है |लेकिन राजस्थान में दोनों तरफ से मरना है |साम्प्रदायिकता का प्रेत भी तो पीछा नहीं छोड़ता |इसका लाभ पूंजी के ठगों को मिलता रहा है |ह्यूगो शावेज की चौथी बार अमरीका की नाक के नीचे जीत उत्साह्दायी है |पृथ्वी कभी वीर-विहीन नहीं होती |इस योद्धा को सलाम |भाभी जी को प्रणाम |आदर सहित ------आपका ------जीवन सिंह

Monday, 8 October 2012

आदरणीय भाई ,आपने जो प्रक्रिया लिखी है ,वह मुझे भी सही लगती है |पहले रमाकांत जी ,फिर त्रिपाठी जी |त्रिपाठी जी से अकेले गाडी नहीं चल पायगी ,लेकिन जयपुर में रहते हुए आपका बहुत बड़ा सहयोग रहेगा |वह सहयोग होगा रचनाएं आमंत्रित करने और मंगाने का |लोग रचनाएं आपको देंगे ,त्रिपाठी जी को नहीं |रमाकांत जी को भी आपकी वजह से ही देते थे ,अन्यथा उनके पास तो मृदुल जी वाली पत्रिका थी ही |किसी को यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि यह कमाई आपकी नहीं है |कृति ओर ---को आपने रोपा है और अपनी दृष्टि से चलाया है और इसके लिए कितनों से नाराजगी मोल ली है |बाकी भाग-दौड़ का सारा काम त्रिपाठी जी कर लेंगे |फिर जब उनका नाम जायगा तो जिम्मेदारी महसूस होगी और वे इसके साथ मन से जुड़ जायेंगे |जिम्मेदारी का भाव व्यक्ति को अपने कर्म के प्रति गंभीर बनाता है |फिर जनवाद और जनवादी साहित्य में उनकी आस्था इससे और सुदृढ़ होगी |वे लोगों को भी समझते हैं |आपका रोज का साथ रहेगा |संवाद से रास्ता निकलेगा |मुझे विश्वास है |वे जयपुर जब आ जायेंगे तब उनके नाम ही एक मेल लिखूंगा |भाभी जी को प्रणाम | आपका -----जीवन सिंह
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आदरणीय भाई ,
बात दरअसल यही है कि अभी तक कोई विश्वसनीय टीम नहीं बन पाई है |यदि ऐसा हुआ होता तो आज यह संकट उपस्थित नहीं हुआ होता |आपने कोशिश भी लगातार की हैं कि टीम बने ,किन्तु व्यक्ति की स्वार्थपरता,महत्त्वाकांक्षा और बिना मेहनत किये जोड़-तोड़ से जल्दी सब कुछ पा लेने ,की प्रवृति ने व्यक्ति को व्यक्ति ही रहने दिया ,|वैसे तो जयपुर में क्या नहीं है किन्तु मन का न हो तो क्या है ?जलेस-प्रलेसों के कलेश ज्यादा है , राहत की बात कोई नहीं |हम प्रलेस छोड़कर जलेस में आये लेकिन क्या हुआ ?|सभी जगह व्यक्ति ही व्यक्ति मिले ,कहीं संघ-समुदाय नहीं मिला |सब अनुयायी चाहने वाले हैं ,कामरेड ,साथी या सच्चा दोस्त नहीं | बहरहाल, कामेश्वर जी ने मुझसे भी लम्बी बातें की थी |'कृति ओर ' को लेकर और आपकी साहित्य -निष्ठा के प्रति उनके मन में बहुत सम्मान है |वे अब पूरी तरह मुक्त भी हो गए होंगे ,इसलिए पूरा सहयोग कर सकते हैं |कृति-ओर जयपुर रहे ,यह सुविधाजनक रहेगा और प्रचार-प्रसार की दृष्टि से सुकर भी |बस कामेश्वर जी से सारा दायित्व संभाल लेने की मंशा को पक्का कर लिया जाय |वे उत्साही हैं ,इच्छा भी है और विश्वसनीय भी हैं ,साहित्य के मामले में साईवाल से ज्यादा समझते हैं ,| वे आपके पूरावक्ती सहयोगी हो सकते हैं जो आपको प्रूफ इत्यादि देखने और पूरे प्रबंधन से मुक्त रख सकें |इससे पहले रमाकांत जी अवसाद से उबरकर सक्रिय हो जाएँ तो कहना ही क्या है | सोचेंगे तो राह भी निकलेगी |आदर सहित -----आपका ----जीवन सिंह

Sunday, 7 October 2012

आदरणीय भाई ,
आपके मेल में व्यक्त आपकी पीड़ा को जान सकता हूँ कि जिस व्यक्ति ने अपने जीवन में एक रास्ता बनाया हो और वह रास्ता एक बिंदु पर जाकर बंद हो जाए तो उस समय जो अहसास होगा ,उसे भुक्तभोगी ही जान सकता है ,लेकिन मैं ये नहीं चाहता कि कोई काम शुरू करके बीच में छोड़ दिया जाय ,इससे अच्छा है कि उस रास्ते चला ही न जाय |अलंकार के बच्चे की वजह से अब कुछ समय तक लगातार व्यवधान आने की आशंका बनी हुई है अन्यथा इस समय हमको यहाँ आने की कोई जरूरत नहीं थी |वह अब भी बार-बार अवधि को आगे बढवाने की कह रहा है |यदि इस समय चले भी जायेंगे तो फिर कुछ समय बाद यहाँ आने की कह रहा है |हमने भी ऐसा कभी नहीं सोचा था |आप जानते हैं कि लोग तो ऐसे जमे-जमाये सम्पादन की तलाश में रहते हैं |लेकिन मैं अपनी परिस्थिति को खुद जानता हूँ |इसलिए मैंने सब कुछ आपको पहले ही लिख दिया |सम्पादन नियमितता चाहता है समय की पूरी पाबंदी |अनियतकालिक पत्रिका तो है नहीं कि जब चाहो तब निकाल लो |भाभी जी को प्रणाम |आदर सहित -------आपका -----जीवन सिंह

Friday, 5 October 2012

आदरणीय भाई ,
आपका ई-पत्र |अपनी जगह तो अपनी ही होती है |गाय भी अपने खूंटे को आसानी से कहाँ भूलती है |सूर ने कहा भी है ----"-मेरो मन अनत कहाँ सचु पावै |जैसे उडि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै ||"महिलाओं की जड़ चूल्हे में होती है | आवास को उनकी भावनाएं ही 'घर' का रूप देती हैं |हमारा मन भी यहाँ से आने को बीच-बीच में तुडाता है , किन्तु विवशता की वजह से मन को नियंत्रित करना पड़ता है |अलंकार को उसके बच्चे की वजह से हमारी जरूरत है |यहाँ सहयोगी तो मिलते नहीं ,घर के लोग सस्ते भी पड़ते हैं और विश्वसनीय भी |वह हमारी वीजा अवधि को और बढवाने की कह रहा है |आगे भी यहाँ अभी और आना जाना पड़ सकता है |इस वजह से 'कृति-ओर'का दायित्व निभा पाना आसान नहीं होगा ,यद्यपि मैं जानता हूँ कि यह कार्य कितना महत्त्वपूर्ण है |वह भी ऐसे समय में जब चारों ओर विचारधारा को दरकिनार किया जा रहा है और लोक की घनघोर उपेक्षा या उसके प्रति कुलीनता वादी रवैया |अच्छा यही रहेगा कि रमाकांत जी अवसादमुक्त होकर इसे करते रहें |उनका मन भी उत्साहित रहता है |कृति-ओर ' का संपादन करते हुए वे अवसादमुक्त रह सकते हैं |आपको यह विश्वास दिला सकता हूँ कि आगे भी मेरा पूरा सहयोग रहेगा |
आनंद प्रकाश जी की मुक्तिबोध पर आई किताब की खबर से चित्त विस्तार हुआ |हिंदी में आती तो क्या बात थी ? ज्ञानरंजन जी को लगा होगा कि शून्य में समय को उनकी जरूरत है | बाकी सब ठीक है |भाभी जी को हमारा प्रणाम कहें | आपका ------जीवन सिंह

Thursday, 4 October 2012

प्रिय नूर भाई ,सलाम मेवात में लगातार निखार आ रहा है |तायल साहब और आप सभी की मेहनत रंग ला रही है |संस्कृति को ----मेवात की संस्कृति को काफी जगह दे रहे हैं आप |जबकि समय कुछ इतना चालू है कि संस्कृति के नाम पर केवल नाच-गाना परोस कर बतला दिया जाता है कि संस्कृति इसी को कहते हैं |संस्कृति में भाव और विचार भी अपनी जगह रखते हैं ,इस बात को अब कितने से लोग मानते और समझते हैं |आवारा पूंजी ने सब कुछ गुड-गोबर कर दिया है |कबीर ने इसी लिए माया को महाठगिनी कहा था |आज तो दुनिया पर यही ठगिनी राज कर रही है |इसमें हमारा किसान-मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा पिसता है |मेहनतकश की सबसे ज्यादा मौत है |मेवाती किसान की मौजूदा जिन्दगी का सही सर्वे करा कर देखा जाय तो बड़े भयावह परिणाम सामने आयेंगे | 'हुक्का पे '---स्तम्भ ठेठ मेवाती के मुहावरे में अपना असर अवश्य बना रहा होगा |इससे लोग अपनी आत्मा को पहचानेगे |इस बोली की अपनी अनूठी ठसक है |बेबाकी से कोई अपनी बात कहने की कला सीखना चाहता है तो कोई मेवाती से सीखे |सिद्दीक भाई को मेरी बधाई जरूर दें |यह व्यक्ति के मन का सतम्भ है |एक जमाने में हुक्का सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक रहा है जो ग्रामीण जीवन में आज भी बचा हुआ है और सामूहिकता को बचाए हुए है |शिक्षा और समाज के बीच के ढीले पड़ते हुए और बेहद व्यावसायिक होते जा रहे रिश्ते को 'सलाम मेवात ' और अधिक तार्किक एवं मानवता की पक्षधर दिशा में ले जाये ,---ऐसी कामना करता हूँ |आपकी पूरी टीम को मुबारकबाद | स्वस्थ -प्रसन्न होंगे | --------जीवन सिंह मानवी ,फिलहाल सिडनी , आस्ट्रेलिया