Thursday, 12 September 2013

अपनी ही गाता हूँ
अपनी ही सुनता हूँ
अपनी ही लीला है
अपनी ही रोटी है ,
अपना ही चीला है
अपना ही गायन है
अपनी रामायण है

अपना ही लाल किला
सब देश अपना है
राम राम जपना है
 पराया माल अपना है
अपनी ही ढपली है
अपना ही राग है
अपने नाम का डंका है
अपन विकास पुरुष हैं
अपनी सोने की लंका है । 

Tuesday, 10 September 2013

मेहनतकश मजदूर-किसान कभी आपस में नहीं लड़ते ,उनको लड़वाते हैं बीच के लोग , जो ज़िंदा शरीरों में आग लगाकर उस पर अपनी राजनीति की रोटी सकते हैं । इन शैतानों का एक ख़ास  वेश  , भाषा और अफवाह फैलाने का ढंग  तो होता ही है , कभी-कभी ये वेश बदलकर  भी  अपना स्वार्थ साधते हैं । ये चुनाव के दिन हैं अब जो कुछ न हो जाय ,थोड़ा है । दंगों में अभी तक उच्च  और उच्च -मध्य वर्ग से कोई हताहत हुआ क्या?  हमेशा गरीब ही क्यों मरता है ? वही तो है जिसे हर समय जीवन के मैदान के बीच रहना पड़ता है । देश की संवेदनशील जनता को बहुत बड़े पैमाने पर जन-जागरण की जरूरत है । 

Monday, 9 September 2013

पिछले कई दिनों से घर की टूट-फूट की मरम्मत का काम चला । एक कारीगर और एक बेलदार ने ग्यारह दिनों तक काम किया । उनको काम करते देख मेरे मन ने ये रूप धारण किया -----

बनवारी कारीगर

वह आता है रोज
अपने गाँव पलखडी से
एक अधटूटी साईकिल पर
दोपहरी करने का
रोटी -झोला लटकाए
आता है रोज बेनागा
रोज कुआ खोदना
रोज पानी पीना
यही जीवन रहा
पीढी दर पीढी
राजतंत्र था तब भी
लोकतंत्र आया तब भी
कोई ख़ास अंतर नहीं
वह नहीं जानता १ ५ अगस्त क्या है ?
उसे पता नहीं
राज कैसे चलता है ?
वह मेहनत  करना जानता है सिर्फ
कला है उसके हाथों में
जादू-सा है उसकी आँखों में
उसके ह्रदय में एक नदी बहती है
ऐसा गुणीजनों में दूर दूर तक नहीं
वे सूखे ठूंठ हैं
वह हरा-भरा वृक्ष

शाम को  जब वह
अपने घर लौट जाता है
तो सूना -सूना लगता है
उसका दोस्ताना फखरू से है
फखरू की राय है कि
बनवारी के कोई शान-गुमान नहीं ।
शायद ऐसा उन लोगों में ज्यादा हो
जो मेहनत  का कमाते हैं
और मेहनत का खाते हैं ।









बनवारी कारीगर

वह आता है रोज
अपने गाँव पलखडी से
एक अधटूटी साईकिल पर
दोपहरी करने का
रोटी -झोला लटकाए
आता है रोज बेनागा
रोज कुआ खोदना
रोज पानी पीना
यही जीवन रहा
पीढी दर पीढी
राजतंत्र था तब भी
लोकतंत्र आया तब भी
कोई ख़ास अंतर नहीं
वह नहीं जानता १ ५ अगस्त क्या है ?
उसे पता नहीं
राज कैसे चलता है ?
वह मेहनत  करना जानता है सिर्फ
कला है उसके हाथों में
जादू-सा है उसकी आँखों में
उसके ह्रदय में एक नदी बहती है
ऐसा गुणीजनों में दूर दूर तक नहीं
वे सूखे ठूंठ हैं
वह हरा-भरा वृक्ष

शाम को  जब वह
अपने घर लौट जाता है
तो सूना -सूना लगता है
उसका दोस्ताना फखरू से है
फखरू की राय है कि
बनवारी के कोई शान-गुमान नहीं ।
शायद ऐसा उन लोगों में ज्यादा हो
जो मेहनत  का कमाते हैं
और मेहनत का खाते हैं ।








Sunday, 8 September 2013

आत्म परिचय ------डा . जीवन सिंह , जन्म----ब्रज-मेवात जनपद , राजस्थान के भरतपुर जिले के जुरेहरा गाँव में १ ९ जुलाई १ ९ ४ ७ के दिन । शिक्षा ---- गाँव, भरतपुर , अलवर, और जयपुर में पी . एच . डी तक । "साहित्य में वैयक्तिकता और वस्तुपरकता " विषय पर ।  रूसी भाषा की अंगरेजी में अनुवादित  कई  पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद । इनमें -"-प्राचीन भारत में प्रगति एवं रूढ़ि " विशेष । ब्रज और मेवात के लोक-साहित्य में विशेष रूचि । राठ -मेवात में प्रसिद्ध  अलीबख्शी ख्यालों पर काम ----पुस्तक प्रकाशनाधीन । अपने गाँव की रामलीला से पिछले चालीस सालों से जुड़ाव ---तीस सालों से खलनायक रावण की भूमिका । एक बार भोपाल और अयोध्या में १ ९ ८ ७ में " सीता - हरण " प्रसंग का प्रदर्शन ।अपने गाँव की रामलीला शैली पर एक किताब प्रकाशन के लिए तैयार ।
   राजस्थान की कालेज शिक्षा सेवा में चूरू ,सुजानगढ़ , सरदारशहर , सिरोही, दौसा, बूंदी , गंगापुर  सिटी  और अलवर में हिंदी -अध्यापन का काम । इस बीच एक वर्ष मध्य प्रदेश के शासकीय महाविद्यालय , श्योपुर कलां में अध्यापन ।
रचना कर्म --- खासकर आलोचना कर्म ---तीन पुस्तकें प्रकाशित -----'-कविता की लोक-प्रकृति' , 'कविता और कवि  कर्म ', और 'शब्द और संस्कृति '।' लोक -दृष्टि और समकालीन कविता" शीघ्र प्रकाश्य । 'कविता और कवि-कर्म' पुस्तक पर राजस्थान साहित्य  अकादमी उदयपुर का सर्वोच्च --मीरा सम्मान २ ० ० १ में मिला । ब्रज भाषा अकादमी से ब्रज भाषा सम्मान मिला ।
निराला , मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन , केदार , कुमारेन्द्र, विजेंद्र आदि लोक- परम्परा के कवियों की कविताओं पर अपनी अर्जित दृष्टि से लेखन ।
वर्तमान में --'जनवादी लेखक संघ ' का सदस्य । कवितायेँ लिखी लेकिन प्रकाशित कराने में संकोच रहा ।

Sunday, 1 September 2013

" कवि"पत्रिका का पुनर्प्रकाशन शुरू होने की बेहद  खुशी है । " कवि" उस दौर की पत्रिका है जब प्रगतिशील-जनवादी ताकतों के समक्ष 'परिमल -समूह' खडा हो रहा था । आज़ादी मिलने के बाद कई रचनाकार उन पांतों में शामिल हो गए थे ,जिनके पथ सत्ता की ओर जाते हैं । 'कवि' सही अर्थों में जनपक्षधर छोटे आकार  की पत्रिका रही है । लगता है एक दौर फिर शुरू हो रहा है , जिसमें "पहल" का भी फिर से प्रकाशन एक घटना है । पहले" कवि " दिल्ली में नहीं था ,अब वह देश की राजधानी और बहुत बदले हुए दौर में है । ऐसी सभी पत्रिकाओं का स्वागत और सहयोग करने की जरूरत है , जो प्रगतिशील-जनवादी जीवनमूल्यों के लिए संघर्ष करती हुई उस परम्परा का विकास कर रही हैं ।
मुक्तिबोध सबसे ज्यादा तब समझ में आते हैं , जब हम दूसरों को नहीं ,खुद को समझना चाहते हैं । वे लीक से अलग हटकर लिखने वाले कवियों में रहे हैं और काव्य-सरिता की धारा के बीचों बीच रहकर लिखने और उसको जीने वाले अनूठे, अद्भुत और विलक्षण कवि । आज की परिस्थितियों में उनकी कविता की प्रासंगिकता और ज्यादा बढ़ गयी है ।