दुनिया और समाज उसकी अर्थ-नीति से चला करते हैं । जब से नव-उदारवादी अर्थ-व्यवस्था लागू हुई , तभी से देश की अपने भाषा -शिक्षण व्यवस्था की यह दशा हुई है । इससे पहले मिश्रित अर्थ-व्यवस्था के दिनों में ऐसा नहीं था । हिंदी माध्यम के स्कूलों में पढ़कर लोग अंगरेजी भी सीख लेते थे । लेकिन जब से वैश्वीकरण की आंधी आई तभी से कैरियरिस्ट मध्य वर्ग इस दिशा की तरफ मुड गया । निजीकरण ने इसको फायदे का सौदा बना दिया । बेरोजगारी की मार ने उनको सस्ते अध्यापक उपलब्ध करा दिए । राष्ट्र-राज्य की भावना में बदलाव आया । अब केवल गरीब वर्ग बचा है जो अपनी समस्याओं के चलते अपने बच्चों को हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों में पढाता है । इससे साफ़-साफ़ वर्ग-भेद नजर आता है । दरअसल , औपनिवेशिक काल की नीतियों में इस सन्दर्भ में कोई बुनियादी बदलाव तो आया नहीं था । देश की अपनी भाषाओं में तेजी से विज्ञान-प्रबंधन आदि की शिक्षा का विस्तार करने की कोई योजना न तो मन से बनी और न ही इस दिशा में कोई बुनियादी काम हुआ । इसलिए विज्ञान-तकनीक आदि क्षेत्रों के ज्ञान के लिए अंगरेजी पर निर्भर रहना पडा । इसका परिणाम यह हुआ कि आज जो अंगरेजी माध्यम का विरोध करता है वह भी अपने बच्चों को अंगरेजी माध्यम से ही पढ़ा रहा है ।
Saturday, 14 September 2013
Friday, 13 September 2013
" कुछ पूरबला लेख" से तो कल्पित जी सब काता -कूता कपास हो जाएगा ।रहा पूरब और पश्चिम का सवाल , इसमें अति-व्याप्ति दोष है । पूरब बहुत बड़ा है और बहुत भिन्नता रखता है । पूरब की अवधारणा में पश्चिम की श्रेष्ठता स्थापित होती है या फिर सब कुछ भारत में पहले से मौजूद था जैसी अंध भारत-विकलता । भारतीयता स्वयं एक तरह की नहीं है । उसमें वेद -विरोधी दर्शन मौजूद हैं , जिनको नास्तिक कहा गया ।महात्मा बुद्ध का दर्शन अदलता -बदलता हुआ कबीर और संत-आन्दोलन तक चला आया है । जो इस समय दलित-विमर्श में नज़र आता है ।
अज्ञेय और निर्मल वर्मा कलाकार ज्यादा हैं , उनके यहाँ भारतीयता की कुछ सीमित छवियाँ होते हुए भी गतिशील भारतीयता की पहचान का कोई विशेष आधार और सबूत नहीं है । फिर उनकी संवेदनशीलता का दायरा बहुत छोटा है । वे चीजों को सही मुकाम तक नहीं ले जाते , जैसे अज्ञेय से उम्र में छोटे मुक्तिबोध ले जाते हैं । यहाँ आकर साहित्य का सवाल जीवन-दृष्टि से जुड़ जाता है ।
अज्ञेय और निर्मल वर्मा कलाकार ज्यादा हैं , उनके यहाँ भारतीयता की कुछ सीमित छवियाँ होते हुए भी गतिशील भारतीयता की पहचान का कोई विशेष आधार और सबूत नहीं है । फिर उनकी संवेदनशीलता का दायरा बहुत छोटा है । वे चीजों को सही मुकाम तक नहीं ले जाते , जैसे अज्ञेय से उम्र में छोटे मुक्तिबोध ले जाते हैं । यहाँ आकर साहित्य का सवाल जीवन-दृष्टि से जुड़ जाता है ।
Thursday, 12 September 2013
वैसे तो सारी मानव- जाति का भाव-संसार एक जैसा है किन्तु पृथ्वी पर मनुष्य के इतिहास -भूगोल ने संस्कृतियों को अनेक रूपों में रचा है । यह अनेकरूपता ही है जो हमको एक करके अनेक कर देती है और अनेक करके एक कर देती है । ऊधो , मन माने की बात । जब हम अपनी जमीन की बात करते हैं तो अनेकरूपता को ही ध्यान में रखते हैं । दुनिया में प्रशासनिक विभाजन और बदलाव चलता रहता है किन्तु इससे संस्कृति नहीं बदला करती । आज भी बांग्ला देश का राष्ट्र गीत रवीन्द्र नाथ ठाकुर का रचा हुआ ही है । सांस्कृतिक रूप से भारत की सीमाएं बहुत बड़ी हैं । यह भारतीय उपमहाद्वीप है । लेकिन इसके भीतर भी अनेक जातियां (नेशन के अर्थ में ) निवास करती हैं , जिनसे मिलकर भारतीयता बनती है । चीनी सभ्यता की पहचान हमसे अलग है ।हमारी अलग अलग भाषाएँ और उनकी लम्बी परम्परा है । ये सब मिलकर एक सांस्कृतिक आधार निर्मित करती हैं जिसे हम अपने सन्दर्भ में भारतीयता कहते हैं । हिंदी कविता उसी भारतीयता का एक अंग है । हमारा अपनी भाषाओं से आवयविक रिश्ता है । इसलिए भारतीय कविता की पहचान करते रहना वैसे ही जरूरी है जैसे अपनी क्षमताओं को समय - समय पर जांचना ।
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ
कि ईख के खेत
इस तरह धधके हों
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ
कि गन्नों का रस
इतना जहरीला हुआ हो
जब ईख बोई जाती है
तो वह हाथ को देखती है ,
उन हाथों में लकीरें होती हैं
जिनके भीतर बहता है
खून इंसानियत का
वे हिन्दू-मुसलमान नहीं होती
उनको मेहनत के रस ने
सींचा होता है
यह क्या हुआ ?
कि हमारे ईख के खेत
मेंड़ों में बट गए
यह खेल कोई और है
अब सब समझ रहे हैं
इस बार जो फसल होगी
वह , वह नहीं होगी
जो तुम समझ कर चल रहे हो ।
कि ईख के खेत
इस तरह धधके हों
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ
कि गन्नों का रस
इतना जहरीला हुआ हो
जब ईख बोई जाती है
तो वह हाथ को देखती है ,
उन हाथों में लकीरें होती हैं
जिनके भीतर बहता है
खून इंसानियत का
वे हिन्दू-मुसलमान नहीं होती
उनको मेहनत के रस ने
सींचा होता है
यह क्या हुआ ?
कि हमारे ईख के खेत
मेंड़ों में बट गए
यह खेल कोई और है
अब सब समझ रहे हैं
इस बार जो फसल होगी
वह , वह नहीं होगी
जो तुम समझ कर चल रहे हो ।
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