कविता में अपना मुहावरा पा लेने का मतलब है अपना व्यक्तित्त्व पा लेना ' जो
बड़ी साधना के बाद मिलता है |अपना मुहावरा न पाने वाले कवियों के लिए ही
ठाकुर बुन्देलखंडी ने ----सीख लीन्हों मीन मृग खंजन कमल नैन /सीख लीनो जस
और प्रताप कौ कहानौ है -----जैसा कवित्त लिखा था किन्तु वे उनको कवि नहीं
मानते थे |पुराना कवि भी छंद का अभ्यास कर लेता था और सभा--दरबारों से इनाम
इकरार भी पा लेता था किन्तु अपना मुहावरा न बन पाने की वजह से कवियों में
ज्यादा समय तक टिक नहीं पाता था |घनानन्द को कहना पडा था-------लोग हैं
लाग कवित्त बनावत , मोहि तो मेरे कवित्त बनावत |यानी अभ्यास से कविता कर
लेना अलग बात है और अपना मुहावरा पा लेना अलग बात |व्यक्तित्त्व्--हीनता
कविता का सबसे बड़ा खोट होता है |उर्दू में शायर तो बहुत हैं किन्तु मीर और
ग़ालिब ने अपने व्यक्तित्त्व से कविता को अमर कर दिया है |सच तो यह है कि
जिस रोज कवि अपना मुहावरा यानी व्यक्तित्त्व पा लेता है उसी दिन वह कवियों
की पांत में खडा हो पाता है |वैसे छापेखाने का और बाज़ार का ज़माना है इसमें
कोई भी कवि बन सकता है
Thursday, 16 July 2015
Friday, 10 July 2015
कवि प्रभात की कविता ---------
कवि प्रभात के पहले और नए कविता संग्रह की एक समीक्षा में उनकी कविता को कैमरा वर्क की तरह निर्लिप्त कहा गया है | जो मेरी दृष्टि में सही नहीं है| कविता कैमरा वर्क जैसी प्रतीत होते हुए भी कैमरा वर्क नहीं होती |यदि ऐसा होता है तो यह प्रकृतवाद है |कोई भी कृति रचना तब बनती है जब उसमें रचनाकार का अपना व्यक्तित्त्व आ जाता है |रचना की पहली शर्त है ---व्यक्तित्त्व | वैसे शास्त्र भी व्यक्तित्त्व के बिना नक़ल कहा जाता है \ शास्त्र अध्येता भी पहले जब अनुसंधान कर लेते हैं तब अपनी स्थापनाओं में अपना व्यक्तित्त्व समाहित करते हैं जो उसकी खोज कहलाती है |पहाड़ों पर चढ़ने वाले पहले लोग जिन्होंने पगडंडियाँ बनाई हैं वे ही सच्चे अनुसंधान करता होते हैं | कवि प्रभात अपनी कविताओं में एक शोधक की भूमिका में भी रहते हैं कि कहीं कुछ छूट तो नहीं रहा है , जो दूसरों की निगाह में नहीं है वह उनकी निगाह में भीतर तक समाया हुआ है | यह उनकी कविता की खासियत है |दूसरे उनकी कविता का मुहावरा उस जगरौटी अंचल का है जो एक जमाने से सवाई माधोपुर जिले में फैला हुआ है |अब यह दौसा और करौली जिलों तक फ़ैल गया है |यहाँ के बोली व्यवहार में ब्रज और ढूँढाडी का एक अद्भुत यौगिक रसायन मिलता है जिसकी वजह से यहाँ के बाशिंदे काजल को भी काजड बोलते हैं |यह राजस्थानी की एक बोली ढूँढाडी का असर है |यदि भाषा का यह संस्कार नहीं होता तो यह कविता भी वैसी ही होती जैसी आमतौर पर मध्य वर्ग के लोग लिखते हैं |दरअसल वह रचना होती है जिसे मशीन नहीं कवि का मन रचता है |मशीन की अपनी उपयोगिता होती है किन्तु वह कभी मनुष्य का स्थान नहीं ले सकती |मैंने भी प्रभात की कवितायेँ पिछले दिनों पढी , उनमें कैमरा से ज्यादा वह जमीन , वह इतिहास , वह भूगोल , वह संस्कृति और सच्चे मन से वहाँ के काम करते हुए बाशिंदे बोलते हैं |क्या काम करते बाशिंदों को कैमरे में कैद किया जा सकता है ? मेरा अनुभव तो यह है कि उनके जीवन की त्रासदियों और सचाइयों को कोई कैमरा सामने नहीं ला सकता | कविता मनुष्य के बाहर के जीवन से ज्यादा उसके भीतर के जीवन की सत्य --कथा होती है ,जिसे हर रचनाकार अपनी तरह से देखता है | कैमरे के एक आँख होती है जबकि कवि सहस्रचक्षु और सहस्रबाहु होता है |
कवि प्रभात के पहले और नए कविता संग्रह की एक समीक्षा में उनकी कविता को कैमरा वर्क की तरह निर्लिप्त कहा गया है | जो मेरी दृष्टि में सही नहीं है| कविता कैमरा वर्क जैसी प्रतीत होते हुए भी कैमरा वर्क नहीं होती |यदि ऐसा होता है तो यह प्रकृतवाद है |कोई भी कृति रचना तब बनती है जब उसमें रचनाकार का अपना व्यक्तित्त्व आ जाता है |रचना की पहली शर्त है ---व्यक्तित्त्व | वैसे शास्त्र भी व्यक्तित्त्व के बिना नक़ल कहा जाता है \ शास्त्र अध्येता भी पहले जब अनुसंधान कर लेते हैं तब अपनी स्थापनाओं में अपना व्यक्तित्त्व समाहित करते हैं जो उसकी खोज कहलाती है |पहाड़ों पर चढ़ने वाले पहले लोग जिन्होंने पगडंडियाँ बनाई हैं वे ही सच्चे अनुसंधान करता होते हैं | कवि प्रभात अपनी कविताओं में एक शोधक की भूमिका में भी रहते हैं कि कहीं कुछ छूट तो नहीं रहा है , जो दूसरों की निगाह में नहीं है वह उनकी निगाह में भीतर तक समाया हुआ है | यह उनकी कविता की खासियत है |दूसरे उनकी कविता का मुहावरा उस जगरौटी अंचल का है जो एक जमाने से सवाई माधोपुर जिले में फैला हुआ है |अब यह दौसा और करौली जिलों तक फ़ैल गया है |यहाँ के बोली व्यवहार में ब्रज और ढूँढाडी का एक अद्भुत यौगिक रसायन मिलता है जिसकी वजह से यहाँ के बाशिंदे काजल को भी काजड बोलते हैं |यह राजस्थानी की एक बोली ढूँढाडी का असर है |यदि भाषा का यह संस्कार नहीं होता तो यह कविता भी वैसी ही होती जैसी आमतौर पर मध्य वर्ग के लोग लिखते हैं |दरअसल वह रचना होती है जिसे मशीन नहीं कवि का मन रचता है |मशीन की अपनी उपयोगिता होती है किन्तु वह कभी मनुष्य का स्थान नहीं ले सकती |मैंने भी प्रभात की कवितायेँ पिछले दिनों पढी , उनमें कैमरा से ज्यादा वह जमीन , वह इतिहास , वह भूगोल , वह संस्कृति और सच्चे मन से वहाँ के काम करते हुए बाशिंदे बोलते हैं |क्या काम करते बाशिंदों को कैमरे में कैद किया जा सकता है ? मेरा अनुभव तो यह है कि उनके जीवन की त्रासदियों और सचाइयों को कोई कैमरा सामने नहीं ला सकता | कविता मनुष्य के बाहर के जीवन से ज्यादा उसके भीतर के जीवन की सत्य --कथा होती है ,जिसे हर रचनाकार अपनी तरह से देखता है | कैमरे के एक आँख होती है जबकि कवि सहस्रचक्षु और सहस्रबाहु होता है |
Thursday, 9 July 2015
व्यापम लीला पद -----२
कैसा ये व्यापम घोटाला |
विन्ध्य -सतपुडा गिरि श्रेणी पर करते नृत्य भूत बेताला ||
चाल चरित्र चेहरा मिलकर ,करते कितना गड़बड़झाला |
बांधे ठाट बिना मेहनत के किये बिना कोई काम कसाला ||
जिसके लाठी हाथ भैंस का मालिक बन बैठा गोआला |
मौत मौत पर मौत देखकर लगे दाल में काला ||
इनकी नैतिकता से नीचा राणा के प्रताप का भाला ||
लोकतंत्र की गाय चौक पर ढूँढत फिरे निवाला |
कहाँ छिपे बैठे रघुनन्दन कहाँ छिपे नंदलाला ||
केवट नाव डुबोकर पूछे कहाँ गया रखवाला |
करे बुराई का अभिनन्दन अच्छाई को देस निकाला ||
कैसा ये व्यापम घोटाला
कैसा ये व्यापम घोटाला |
विन्ध्य -सतपुडा गिरि श्रेणी पर करते नृत्य भूत बेताला ||
चाल चरित्र चेहरा मिलकर ,करते कितना गड़बड़झाला |
बांधे ठाट बिना मेहनत के किये बिना कोई काम कसाला ||
जिसके लाठी हाथ भैंस का मालिक बन बैठा गोआला |
मौत मौत पर मौत देखकर लगे दाल में काला ||
इनकी नैतिकता से नीचा राणा के प्रताप का भाला ||
लोकतंत्र की गाय चौक पर ढूँढत फिरे निवाला |
कहाँ छिपे बैठे रघुनन्दन कहाँ छिपे नंदलाला ||
केवट नाव डुबोकर पूछे कहाँ गया रखवाला |
करे बुराई का अभिनन्दन अच्छाई को देस निकाला ||
कैसा ये व्यापम घोटाला
मैया री मोहे व्यापम भावै |
मध्य देस के माहि बिराजत न्याय कू सींग दिखावै |
संस्किरिति की पूंछ पकरि के भैयन कू तिरवावे ||
मांग करे कोऊ न्याय करौ रे , वाकू आँख दिखावै |
याकू करो प्रणाम नहीं तो दुनिया सू हट जावे |
जीवन बी याकी संगति में अपने पाप धुबाबै ||
कामधेनु सी व्यापम तजि के छेरी कौन दुहावै |
आगो पीछो देखि के जीवन व्यापम के लीला पद गाबै||
मध्य देस के माहि बिराजत न्याय कू सींग दिखावै |
संस्किरिति की पूंछ पकरि के भैयन कू तिरवावे ||
मांग करे कोऊ न्याय करौ रे , वाकू आँख दिखावै |
याकू करो प्रणाम नहीं तो दुनिया सू हट जावे |
जीवन बी याकी संगति में अपने पाप धुबाबै ||
कामधेनु सी व्यापम तजि के छेरी कौन दुहावै |
आगो पीछो देखि के जीवन व्यापम के लीला पद गाबै||
Wednesday, 8 July 2015
व्यापम लीला के पद
व्यापम व्यापम व्यापम व्यापम
पूरे देश में व्यापम व्यापम|
नेता को वरदान मगर ये जनता को ज़िंदा अभिशापम |
मौत सिरहाने खडी ताकती व्यापम वैसा जैसी खापम |
यहाँ भी व्यापम वहाँ भी व्यापम व्यापम का फैला है पापम | |
उत्तर व्यापम दक्षिण व्यापम पूरब पश्चिम व्यापम व्यापम ||
व्यापम की महिमा से पलते गुंडे नेता अधम कलापम |
मिलीभगत नौकरशाहों की इनकी अलग बनी है छापम ||
देश संपदा कब्जा करके मीठा मीठा गप्प सडाकम ||
हर हर गंगे हर हर गंगे बैठ करो सब माला जापम ||
उसको क्या परवाह व्यापम की जो घर में बैठा है धापम ||
अपना भला चाहते 'जीवन' तुम भी भज लो व्यापम व्यापम ||
व्यापम व्यापम व्यापम व्यापम
पूरे देश में व्यापम व्यापम|
नेता को वरदान मगर ये जनता को ज़िंदा अभिशापम |
मौत सिरहाने खडी ताकती व्यापम वैसा जैसी खापम |
यहाँ भी व्यापम वहाँ भी व्यापम व्यापम का फैला है पापम | |
उत्तर व्यापम दक्षिण व्यापम पूरब पश्चिम व्यापम व्यापम ||
व्यापम की महिमा से पलते गुंडे नेता अधम कलापम |
मिलीभगत नौकरशाहों की इनकी अलग बनी है छापम ||
देश संपदा कब्जा करके मीठा मीठा गप्प सडाकम ||
हर हर गंगे हर हर गंगे बैठ करो सब माला जापम ||
उसको क्या परवाह व्यापम की जो घर में बैठा है धापम ||
अपना भला चाहते 'जीवन' तुम भी भज लो व्यापम व्यापम ||
Wednesday, 7 January 2015
दुःख
कहाँ समझ में आता है
आसानी से दुःख
दुःख अपना ही नहीं समझ पाते लोग
कारण समझ पाना
और भी मुश्किल
अभी तक जो कारण बतलाए गए
गलत साबित हुए
कहीं भी नहीं पहुच पाए
उन कारणों का प्रलाप करते हुए
भेड़ चाल से
वे आज तक दुनिया को भटका रहे हैं
और आपस में लडवा रहे हैं
उनके झंडे खून से रंगे हुए हैं
क्योंकि उनको अभी तक असली कारणों का पता नहीं चला है
मेरे नगर के
कम्पनी बाग़ के सामने लगा वट वृक्ष
कितनी यादों में समाया हुआ रहा
तब तक
जब तक उसे ज़िंदा रखने के कारण बने रहे
अब वह कहीं नहीं
तक तक खडा रहा वह
जब तक उसका हवा पानी और आग---धरती
और आकाश से तालमेल बना रहा
दुःख का मतलब है सही तालमेल की कमी
यह सदियों से गायब है हमारे देश में
एक औरत ने जब अपना दुःख दूसरी औरत से गिडगिडाते हुए कहा
वह कहाँ समझ पाई
उसने उसकी मजाक उड़ाई
वह अनुनय विनय करती रही
उसने उसको देवी और मालकिन तक कहा
लेकिन वह न समझ पाई उसका दुःख
उसकी दुनिया उससे बहुत अलग और दूर की दुनिया थी
यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि
हम अपने दुःख उनको सुनाते हैं
जिनके न कान होते हैं
न आँख
न दिमाग
दिल नाम की चीज तो दूर दूर तक नहीं होती
पत्थरों ने बहती नदियों को हमेशा से रोककर रखा है
नदियाँ जब जब बही हैं
अपनी ताकत से बही हैं
पत्थरों को चुन लेने से लोकतंत्र की बहती नदी रुकती है
हम ने उनको अपना नेता चुन लिया है
जो समय के सबसे बड़े दस्युओं से मिले हुए हैं
यह हमारी गलती और सबसे बड़ी चूक रही है कि
हमने अपना सही विकल्प नहीं बनाया
हमने वह पेड़ तैयार नहीं किया
जो बिन मांगे छाया देता है
हम उस सूरज के पास नहीं गए
जो पूस की ठण्ड से सबको बचाता है
सूरज से हमने लोकतंत्र का पाठ नहीं पढ़ा
हमने अपनी प्यारी धरती से भी कुछ नहीं सीखा
उसको भी बाँट---बेचकर हम खाते रहे
हमने जिनसे दोस्ती गांठी
और जिनको अपना प्रतिनिधि चुना
वे हमारे थे ही नहीं
दुखों की गठरी को ढोते हुए
हम वहाँ पहुचे
जहां पहले से भूतों का डेरा जमा हुआ था
वे हमेशा भूतकाल की बात करते थे
वे न वर्तमान को जानते थे
न भविष्य को समझते थे
दुःख के सागर में
फिलहाल हवाएं अनुकूल नहीं हैं
नौका के पालों में कितने छेद हो चुके हैं
वे जीर्ण--शीर्ण हो चुकी हैं
उनको संवार कर ही हम आगे बढ़ सकते हैं
और उस दुनिया की खोज कर सकते हैं
जहां सूरज की तरह
सबको रोशनी मुहैय्या होती है |
कहाँ समझ में आता है
आसानी से दुःख
दुःख अपना ही नहीं समझ पाते लोग
कारण समझ पाना
और भी मुश्किल
अभी तक जो कारण बतलाए गए
गलत साबित हुए
कहीं भी नहीं पहुच पाए
उन कारणों का प्रलाप करते हुए
भेड़ चाल से
वे आज तक दुनिया को भटका रहे हैं
और आपस में लडवा रहे हैं
उनके झंडे खून से रंगे हुए हैं
क्योंकि उनको अभी तक असली कारणों का पता नहीं चला है
मेरे नगर के
कम्पनी बाग़ के सामने लगा वट वृक्ष
कितनी यादों में समाया हुआ रहा
तब तक
जब तक उसे ज़िंदा रखने के कारण बने रहे
अब वह कहीं नहीं
तक तक खडा रहा वह
जब तक उसका हवा पानी और आग---धरती
और आकाश से तालमेल बना रहा
दुःख का मतलब है सही तालमेल की कमी
यह सदियों से गायब है हमारे देश में
एक औरत ने जब अपना दुःख दूसरी औरत से गिडगिडाते हुए कहा
वह कहाँ समझ पाई
उसने उसकी मजाक उड़ाई
वह अनुनय विनय करती रही
उसने उसको देवी और मालकिन तक कहा
लेकिन वह न समझ पाई उसका दुःख
उसकी दुनिया उससे बहुत अलग और दूर की दुनिया थी
यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि
हम अपने दुःख उनको सुनाते हैं
जिनके न कान होते हैं
न आँख
न दिमाग
दिल नाम की चीज तो दूर दूर तक नहीं होती
पत्थरों ने बहती नदियों को हमेशा से रोककर रखा है
नदियाँ जब जब बही हैं
अपनी ताकत से बही हैं
पत्थरों को चुन लेने से लोकतंत्र की बहती नदी रुकती है
हम ने उनको अपना नेता चुन लिया है
जो समय के सबसे बड़े दस्युओं से मिले हुए हैं
यह हमारी गलती और सबसे बड़ी चूक रही है कि
हमने अपना सही विकल्प नहीं बनाया
हमने वह पेड़ तैयार नहीं किया
जो बिन मांगे छाया देता है
हम उस सूरज के पास नहीं गए
जो पूस की ठण्ड से सबको बचाता है
सूरज से हमने लोकतंत्र का पाठ नहीं पढ़ा
हमने अपनी प्यारी धरती से भी कुछ नहीं सीखा
उसको भी बाँट---बेचकर हम खाते रहे
हमने जिनसे दोस्ती गांठी
और जिनको अपना प्रतिनिधि चुना
वे हमारे थे ही नहीं
दुखों की गठरी को ढोते हुए
हम वहाँ पहुचे
जहां पहले से भूतों का डेरा जमा हुआ था
वे हमेशा भूतकाल की बात करते थे
वे न वर्तमान को जानते थे
न भविष्य को समझते थे
दुःख के सागर में
फिलहाल हवाएं अनुकूल नहीं हैं
नौका के पालों में कितने छेद हो चुके हैं
वे जीर्ण--शीर्ण हो चुकी हैं
उनको संवार कर ही हम आगे बढ़ सकते हैं
और उस दुनिया की खोज कर सकते हैं
जहां सूरज की तरह
सबको रोशनी मुहैय्या होती है |
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