यदि कवि के मुहावरे में ठहराव होगा तो कविता भी ठहर जायगी |तत्त्व के लिए
संघर्ष से लगाकर कवि को अभिव्यक्ति के संघर्ष तक की यात्रा पूरी करनी होती
है | इसीलिये अभिव्यक्ति के क्षण को मुक्तिबोध तीसरा और सबसे लंबा क्षण
मानते हैं |एक बार मुहावरा अर्जित कर लेने वाले कवि ठहराव के शिकार खूब
होते हैं |इसलिए मुहावरा भी एक विकसनशील प्रक्रिया ही है | वह कविता की
अंतर्वस्तु से संबद्ध है |रीतिवाद का खतरा तब आता है जब कवि तत्त्व के लिए
संघर्ष करना बंद कर देता है | तब वह दोनों स्तरों पर ठहराव का शिकार हो
जाता है |
Friday, 17 July 2015
Thursday, 16 July 2015
कविता में अपना मुहावरा पा लेने का मतलब है अपना व्यक्तित्त्व पा लेना ' जो
बड़ी साधना के बाद मिलता है |अपना मुहावरा न पाने वाले कवियों के लिए ही
ठाकुर बुन्देलखंडी ने ----सीख लीन्हों मीन मृग खंजन कमल नैन /सीख लीनो जस
और प्रताप कौ कहानौ है -----जैसा कवित्त लिखा था किन्तु वे उनको कवि नहीं
मानते थे |पुराना कवि भी छंद का अभ्यास कर लेता था और सभा--दरबारों से इनाम
इकरार भी पा लेता था किन्तु अपना मुहावरा न बन पाने की वजह से कवियों में
ज्यादा समय तक टिक नहीं पाता था |घनानन्द को कहना पडा था-------लोग हैं
लाग कवित्त बनावत , मोहि तो मेरे कवित्त बनावत |यानी अभ्यास से कविता कर
लेना अलग बात है और अपना मुहावरा पा लेना अलग बात |व्यक्तित्त्व्--हीनता
कविता का सबसे बड़ा खोट होता है |उर्दू में शायर तो बहुत हैं किन्तु मीर और
ग़ालिब ने अपने व्यक्तित्त्व से कविता को अमर कर दिया है |सच तो यह है कि
जिस रोज कवि अपना मुहावरा यानी व्यक्तित्त्व पा लेता है उसी दिन वह कवियों
की पांत में खडा हो पाता है |वैसे छापेखाने का और बाज़ार का ज़माना है इसमें
कोई भी कवि बन सकता है
Friday, 10 July 2015
कवि प्रभात की कविता ---------
कवि प्रभात के पहले और नए कविता संग्रह की एक समीक्षा में उनकी कविता को कैमरा वर्क की तरह निर्लिप्त कहा गया है | जो मेरी दृष्टि में सही नहीं है| कविता कैमरा वर्क जैसी प्रतीत होते हुए भी कैमरा वर्क नहीं होती |यदि ऐसा होता है तो यह प्रकृतवाद है |कोई भी कृति रचना तब बनती है जब उसमें रचनाकार का अपना व्यक्तित्त्व आ जाता है |रचना की पहली शर्त है ---व्यक्तित्त्व | वैसे शास्त्र भी व्यक्तित्त्व के बिना नक़ल कहा जाता है \ शास्त्र अध्येता भी पहले जब अनुसंधान कर लेते हैं तब अपनी स्थापनाओं में अपना व्यक्तित्त्व समाहित करते हैं जो उसकी खोज कहलाती है |पहाड़ों पर चढ़ने वाले पहले लोग जिन्होंने पगडंडियाँ बनाई हैं वे ही सच्चे अनुसंधान करता होते हैं | कवि प्रभात अपनी कविताओं में एक शोधक की भूमिका में भी रहते हैं कि कहीं कुछ छूट तो नहीं रहा है , जो दूसरों की निगाह में नहीं है वह उनकी निगाह में भीतर तक समाया हुआ है | यह उनकी कविता की खासियत है |दूसरे उनकी कविता का मुहावरा उस जगरौटी अंचल का है जो एक जमाने से सवाई माधोपुर जिले में फैला हुआ है |अब यह दौसा और करौली जिलों तक फ़ैल गया है |यहाँ के बोली व्यवहार में ब्रज और ढूँढाडी का एक अद्भुत यौगिक रसायन मिलता है जिसकी वजह से यहाँ के बाशिंदे काजल को भी काजड बोलते हैं |यह राजस्थानी की एक बोली ढूँढाडी का असर है |यदि भाषा का यह संस्कार नहीं होता तो यह कविता भी वैसी ही होती जैसी आमतौर पर मध्य वर्ग के लोग लिखते हैं |दरअसल वह रचना होती है जिसे मशीन नहीं कवि का मन रचता है |मशीन की अपनी उपयोगिता होती है किन्तु वह कभी मनुष्य का स्थान नहीं ले सकती |मैंने भी प्रभात की कवितायेँ पिछले दिनों पढी , उनमें कैमरा से ज्यादा वह जमीन , वह इतिहास , वह भूगोल , वह संस्कृति और सच्चे मन से वहाँ के काम करते हुए बाशिंदे बोलते हैं |क्या काम करते बाशिंदों को कैमरे में कैद किया जा सकता है ? मेरा अनुभव तो यह है कि उनके जीवन की त्रासदियों और सचाइयों को कोई कैमरा सामने नहीं ला सकता | कविता मनुष्य के बाहर के जीवन से ज्यादा उसके भीतर के जीवन की सत्य --कथा होती है ,जिसे हर रचनाकार अपनी तरह से देखता है | कैमरे के एक आँख होती है जबकि कवि सहस्रचक्षु और सहस्रबाहु होता है |
कवि प्रभात के पहले और नए कविता संग्रह की एक समीक्षा में उनकी कविता को कैमरा वर्क की तरह निर्लिप्त कहा गया है | जो मेरी दृष्टि में सही नहीं है| कविता कैमरा वर्क जैसी प्रतीत होते हुए भी कैमरा वर्क नहीं होती |यदि ऐसा होता है तो यह प्रकृतवाद है |कोई भी कृति रचना तब बनती है जब उसमें रचनाकार का अपना व्यक्तित्त्व आ जाता है |रचना की पहली शर्त है ---व्यक्तित्त्व | वैसे शास्त्र भी व्यक्तित्त्व के बिना नक़ल कहा जाता है \ शास्त्र अध्येता भी पहले जब अनुसंधान कर लेते हैं तब अपनी स्थापनाओं में अपना व्यक्तित्त्व समाहित करते हैं जो उसकी खोज कहलाती है |पहाड़ों पर चढ़ने वाले पहले लोग जिन्होंने पगडंडियाँ बनाई हैं वे ही सच्चे अनुसंधान करता होते हैं | कवि प्रभात अपनी कविताओं में एक शोधक की भूमिका में भी रहते हैं कि कहीं कुछ छूट तो नहीं रहा है , जो दूसरों की निगाह में नहीं है वह उनकी निगाह में भीतर तक समाया हुआ है | यह उनकी कविता की खासियत है |दूसरे उनकी कविता का मुहावरा उस जगरौटी अंचल का है जो एक जमाने से सवाई माधोपुर जिले में फैला हुआ है |अब यह दौसा और करौली जिलों तक फ़ैल गया है |यहाँ के बोली व्यवहार में ब्रज और ढूँढाडी का एक अद्भुत यौगिक रसायन मिलता है जिसकी वजह से यहाँ के बाशिंदे काजल को भी काजड बोलते हैं |यह राजस्थानी की एक बोली ढूँढाडी का असर है |यदि भाषा का यह संस्कार नहीं होता तो यह कविता भी वैसी ही होती जैसी आमतौर पर मध्य वर्ग के लोग लिखते हैं |दरअसल वह रचना होती है जिसे मशीन नहीं कवि का मन रचता है |मशीन की अपनी उपयोगिता होती है किन्तु वह कभी मनुष्य का स्थान नहीं ले सकती |मैंने भी प्रभात की कवितायेँ पिछले दिनों पढी , उनमें कैमरा से ज्यादा वह जमीन , वह इतिहास , वह भूगोल , वह संस्कृति और सच्चे मन से वहाँ के काम करते हुए बाशिंदे बोलते हैं |क्या काम करते बाशिंदों को कैमरे में कैद किया जा सकता है ? मेरा अनुभव तो यह है कि उनके जीवन की त्रासदियों और सचाइयों को कोई कैमरा सामने नहीं ला सकता | कविता मनुष्य के बाहर के जीवन से ज्यादा उसके भीतर के जीवन की सत्य --कथा होती है ,जिसे हर रचनाकार अपनी तरह से देखता है | कैमरे के एक आँख होती है जबकि कवि सहस्रचक्षु और सहस्रबाहु होता है |
Thursday, 9 July 2015
व्यापम लीला पद -----२
कैसा ये व्यापम घोटाला |
विन्ध्य -सतपुडा गिरि श्रेणी पर करते नृत्य भूत बेताला ||
चाल चरित्र चेहरा मिलकर ,करते कितना गड़बड़झाला |
बांधे ठाट बिना मेहनत के किये बिना कोई काम कसाला ||
जिसके लाठी हाथ भैंस का मालिक बन बैठा गोआला |
मौत मौत पर मौत देखकर लगे दाल में काला ||
इनकी नैतिकता से नीचा राणा के प्रताप का भाला ||
लोकतंत्र की गाय चौक पर ढूँढत फिरे निवाला |
कहाँ छिपे बैठे रघुनन्दन कहाँ छिपे नंदलाला ||
केवट नाव डुबोकर पूछे कहाँ गया रखवाला |
करे बुराई का अभिनन्दन अच्छाई को देस निकाला ||
कैसा ये व्यापम घोटाला
कैसा ये व्यापम घोटाला |
विन्ध्य -सतपुडा गिरि श्रेणी पर करते नृत्य भूत बेताला ||
चाल चरित्र चेहरा मिलकर ,करते कितना गड़बड़झाला |
बांधे ठाट बिना मेहनत के किये बिना कोई काम कसाला ||
जिसके लाठी हाथ भैंस का मालिक बन बैठा गोआला |
मौत मौत पर मौत देखकर लगे दाल में काला ||
इनकी नैतिकता से नीचा राणा के प्रताप का भाला ||
लोकतंत्र की गाय चौक पर ढूँढत फिरे निवाला |
कहाँ छिपे बैठे रघुनन्दन कहाँ छिपे नंदलाला ||
केवट नाव डुबोकर पूछे कहाँ गया रखवाला |
करे बुराई का अभिनन्दन अच्छाई को देस निकाला ||
कैसा ये व्यापम घोटाला
मैया री मोहे व्यापम भावै |
मध्य देस के माहि बिराजत न्याय कू सींग दिखावै |
संस्किरिति की पूंछ पकरि के भैयन कू तिरवावे ||
मांग करे कोऊ न्याय करौ रे , वाकू आँख दिखावै |
याकू करो प्रणाम नहीं तो दुनिया सू हट जावे |
जीवन बी याकी संगति में अपने पाप धुबाबै ||
कामधेनु सी व्यापम तजि के छेरी कौन दुहावै |
आगो पीछो देखि के जीवन व्यापम के लीला पद गाबै||
मध्य देस के माहि बिराजत न्याय कू सींग दिखावै |
संस्किरिति की पूंछ पकरि के भैयन कू तिरवावे ||
मांग करे कोऊ न्याय करौ रे , वाकू आँख दिखावै |
याकू करो प्रणाम नहीं तो दुनिया सू हट जावे |
जीवन बी याकी संगति में अपने पाप धुबाबै ||
कामधेनु सी व्यापम तजि के छेरी कौन दुहावै |
आगो पीछो देखि के जीवन व्यापम के लीला पद गाबै||
Wednesday, 8 July 2015
व्यापम लीला के पद
व्यापम व्यापम व्यापम व्यापम
पूरे देश में व्यापम व्यापम|
नेता को वरदान मगर ये जनता को ज़िंदा अभिशापम |
मौत सिरहाने खडी ताकती व्यापम वैसा जैसी खापम |
यहाँ भी व्यापम वहाँ भी व्यापम व्यापम का फैला है पापम | |
उत्तर व्यापम दक्षिण व्यापम पूरब पश्चिम व्यापम व्यापम ||
व्यापम की महिमा से पलते गुंडे नेता अधम कलापम |
मिलीभगत नौकरशाहों की इनकी अलग बनी है छापम ||
देश संपदा कब्जा करके मीठा मीठा गप्प सडाकम ||
हर हर गंगे हर हर गंगे बैठ करो सब माला जापम ||
उसको क्या परवाह व्यापम की जो घर में बैठा है धापम ||
अपना भला चाहते 'जीवन' तुम भी भज लो व्यापम व्यापम ||
व्यापम व्यापम व्यापम व्यापम
पूरे देश में व्यापम व्यापम|
नेता को वरदान मगर ये जनता को ज़िंदा अभिशापम |
मौत सिरहाने खडी ताकती व्यापम वैसा जैसी खापम |
यहाँ भी व्यापम वहाँ भी व्यापम व्यापम का फैला है पापम | |
उत्तर व्यापम दक्षिण व्यापम पूरब पश्चिम व्यापम व्यापम ||
व्यापम की महिमा से पलते गुंडे नेता अधम कलापम |
मिलीभगत नौकरशाहों की इनकी अलग बनी है छापम ||
देश संपदा कब्जा करके मीठा मीठा गप्प सडाकम ||
हर हर गंगे हर हर गंगे बैठ करो सब माला जापम ||
उसको क्या परवाह व्यापम की जो घर में बैठा है धापम ||
अपना भला चाहते 'जीवन' तुम भी भज लो व्यापम व्यापम ||
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