Wednesday, 29 August 2012

गढ़ का तिरछा परकोटा ---------
एक था आदमी बहुत बहुत
नहीं मिला मकान किराये पर
जयपुर महानगर में
वह नागरिक था
सबसे निचली सीढ़ी का
माँ ने जन्म दिया था जैसे
वह उसी मार्ग से आया था
जिससे आती है पूरी दुनिया
दोष उसका था यही
अपराध भी कि
क्यों नहीं कुछ कर पाया कि
कला सीख लेता गर्भ -परिवर्तन की
यह दुर्ग है मित्र
बहुत पुराना
रक्त-दुर्ग
इसकी गलियों का
चक्रव्यूह बनता रहा सदियों से
मन की चट्टान पर बना
अहम् के उत्तुंग शिखर पर
वृहदाकार विस्तीर्ण परकोटा























विजेंद्र जी ने रिल्के के बहाने से बड़ी महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं ,लेकिन वे उन लोगों के लिए ही अर्थवान हैं जो कविता और जीवन में एक बड़ा और गंभीर रिश्ता मानते हैं और अपने व्यवहार से उसको प्रमाणित भी करते हैं |ये बातें उन लोगों को बहुत बुरी और व्यर्थ लग सकती हैं , जो आज भी अपने प्रगतिशील चेहरे के भीतर कला की कीमियागीरी में ज्यादा विश्वास रखकर कविता करते हैं |उनको कला और जनवादी अंतर्वस्तु वाली कविताओं में जनवाद से ज्यादा कलावादी रूप-विधान इसलिए भी प्रभावित करता है क्योंकि तुरत चर्चा और तुरत प्रसिद्धी मिलने की सहूलियत यहीं रहती है |उस जनवाद का क्या फायदा जहां कवि को लम्बी उपेक्षा और कुछ साधनापरक जीवन जीने की जरूरत रहती है | जो केवल कविता में ही जीवन-मूल्यों की डींग नहीं हांकता बल्कि अपने जीवन व्यवहार से भी उनको कुछ जीकर दिखलाता है |जो कला बिना जीवन के अंतर्मन में उपज जाय ,,उसमें परिश्रमी , मानवीय तथा साफ-सुथरा जीवन जीने की शर्त से भी कवि बच जाता है |कलावाद के होकर आप मनचाहा मूल्यरहित जीवन जी सकते हैं वहाँ सभी तरह की छूट होती है जब कि मेहनतकश जन के साथ रहने में असुविधाओं और उपेक्षाओं के जंगल से गुजरना पड़ता है | कलावाद में गडबडझाले की कला बहुत चलती है और एक क्रूर अवसरवाद की जगह भी निकल आती है | कलावाद के साथ रहने में सबसे बड़ा फायदा बुर्जुआ समाज और पूंजी के खुले बाज़ार में कबड्डी खेलते रहने की छूट मिलना भी है | व्यक्ति-स्वातंत्र्य के वितान के नीचे आ जाने से अनेक तरह के अख्तियार पाने के अवसर सहज प्राप्त हो जाते है | जैसे जनवाद की एक पूरी जीवन व्यवस्था और जीवन पद्धति होती है वैसे ही कलावाद की भी | ऐसे लोग मुक्तिबोध और अज्ञेय दोनों को एक तराजू में तोलने की कला भी जानते हैं और जिन्दगी भर तेरी भी जय जय और मेरी भी जय का राग अलापते हैं |ये कबीर का उदाहरण तो देंगे ,लेकिन उनके ' दुखिया दास कबीर ' की पूरी तरह अनदेखी करके | वे इस बात पर गौर नहीं फरमाते कि आखिर अच्छा -खासा चादर बुनकर कमाई करने वाला कबीर स्वयं को दुखिया क्यों मानता है ?

Thursday, 23 August 2012

परसाई जी जैसा ऊंचाइयों वाला लेखक ही संबंधों में इतना गहरे उतरकर लिख सकता है |जहाँ वास्तव में मनुष्यता का लहलहाता हुआ तालाब हैं वहीँ ऐसी लहरें उठ सकती हैं |मुक्तिबोध अपने जीवन और कविता में एक जैसे थे , उनमें वह फांक नहीं थी जो आमतोर पर कवियों - साहित्यकारों में देखने को मिलती है |लिखना कुछ और करना कुछ , | कितने साहित्यकार हैं , जिनके ऐसे संस्मरण हैं ?पढ़ते हुए आज भी आँखों में आंसू आये बिना नहीं रहते |

Wednesday, 22 August 2012

ये नदी नदी ,ये नदी नदी
पानी से रहती लदी फदी
पानी ही इसका जीवन है
पानी ही इसका तन मन है
पानी ही इसका आँगन है
पानी ही एकमात्र धन है |
पानी इसका यह पानी की
पानी की अपनी निकट सगी |
पानी को रखने से जीवन
पानी बिन सब कुछ सूना है
पानी आँखों का निकल गया
तो सब कुछ मिट्टी चूना है
पानी होगा तो यह होगी
पानी की इसकी शर्त बदी |





Tuesday, 21 August 2012

 कविता के समाजशास्त्र को लेकर जो चिंता श्री प्रफ्फुल कोलख्यान जी ने जाहिर की है ,उसका स्वागत किया जाना चाहिए किन्तु कविता के समाजशात्र की बजाय कविता और समाज के रिश्तों के सभी आयामों का तर्कसंगत एवं प्रामाणिक विश्लेषण करते हुए पहले कुछ जरूरी बिन्दुओं को साफ़ कर लेना चाहिए ,इनमें कविता और समाज के साथ कवि को भी रखना आवश्यक है |कविता और समाज पर बात करते हुए अक्सर कवि को छोड़ दिया जाता है ,जबकि कविता और समाज के बीच कवि महत्त्वपूर्ण कड़ी होता है | यह कवि ही तो है जो सारी लीला रचता है | ,अत कविता और समाज के बीच उस कवि-चरित्र का विश्लेषण भी बहुत जरूरी है ,जिसके ऊपर मुक्तिबोध ने अपने समय में बहुत जोर दिया था |उस समय उनको अपने आस-पास के साथी मित्र -कवि उच्च एवं उच्च-मध्यवर्गीय जीवन जीने की आंकाक्षाओं के जंगल के भीतर विचरण करते दिखाई देते थे इस उत्तर -आधुनिक समय में तो हालात और विकट हो गए हैं |इसलिए जो भी विचार-प्रक्रिया बनती है वह बहुत ऊपरी और सतही चर्चा की तरह होकर रह जाती है |मुक्तिबोध की इस बात का हमारे पास क्या जवाब है -----जिसमें डोमाजी उस्ताद के साथ जुलूस में साहित्यकार भी शामिल है |इसलिए कविता की चिंता के साथ-साथ जीवन की चिंता उससे ज्यादा होनी चाहिए ,|खासतौर से उस समाज-वर्ग की, जहाँ समाज के साथ- साथ जीवन भी बचा हुआ है |समाज तो अनेक तरह के लोगों से मिलकर बनता है किन्तु जीवन ----सच्चे अर्थ में वहीँ होता है जहाँ लोगों की 'आत्मा'' जीवित रहती है |इसलिए मुक्तिबोध ने आत्मा के सवाल को कविता में जिस तरह से रचाया-बसाया है ,वैसा कोई दूसरा नहीं कर पाया |उनके लिए कविता ,जीवन-मरण जैसा प्रश्न बन गया था उन्ही के शब्दों में " जीवन चिंता के बिना साहित्य -चिंता नहीं हो सकती |जीवन चिंता के अभाव में साहित्यिक आलोचना निष्फल और वृथा है |किन्तु यह जीवन - चिंतन व्यापक जीवन जगत में घनिष्ठ और गंभीर भाग लिए बिना रीता है |" कहने की जरूरत नहीं कि मुक्तिबोध ''व्यापक जीवन-जगत में घनिष्ठ और गंभीर भाग " लेने की बात करते हैं |इसके अभाव में कविता का जो समाजशास्त्र बनेगा वह मध्यवर्गीय समाज की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर पायेगा , जैसे कविता नहीं कर पाती है |
 

Monday, 20 August 2012

नीलाम्बुज जी ,आज तक जो भी दुनिया हमारे सामने है वह यदि मानव - मन की रचना नहीं है तो और क्या है ?यह अलग बात है कि वह सबकी मनभावनी दुनिया न हो |प्रयत्न लगातार यही हो रहे हैं कि यह सबके मन की बनती चली जाए |अभी यह वर्गीय मन के अनुसार बनी है ,इस वजह से वर्ग - संघर्ष के नए-नए रूप सामने आते रहते हैं |आपने मनोमय कोष की बात सुनी होगी |यही मन है जो सारे झगडे-फसादों की जड़ है |आपने सुना होगा कि "मन के हारे हार है और मन के जीते जीत" कहावत वाली बात | सूर का एक मशहूर पद भी आपने अवश्य सुना होगा ----ऊधो , मन नाही दस-बीस | मन अन्य प्राणियों का भी होता है ,लेकिन मष्तिष्क (जो मन ही है )के पिछड़ जाने के कारण वह प्रकृति के समानांतर अपनी वैसी दुनिया नहीं बना पाया ,जैसी आदमी ने बना ली है |यद्यपि उसके सीमित मन की भी अपनी दुनिया होती है |पशु- पक्षियों पर रचे गए साहित्य में उनके मन को खोजा जा सकता है |इसी तरह पेड़ों और वनस्पति तक की यात्रा की जा सकती है |बहरहाल मुझे ऐसा ही लगता रहा है |इसी तरह जैसे व्यक्ति-मन होता है वैसे ही सामूहिक मन भी होता है |कबीलों ,जाति-समूहों ,समुदायों ,भाषिक-समूहों,धर्म-सम्प्रदायों और राष्ट्रों का निर्माण इसी सामूहिक मन की वजह से होता है |वर्गीय मन भी सामूहिक मन का ही एक रूप होता है |फेस बुक पर भी एक सामूहिक मन नज़र आता है ,अपनी व्यक्तिगत भिन्नताओं के साथ |

Sunday, 19 August 2012

कवि लिखता है कविता
छपता है पत्रिकाओं में
सुनाता है कविता गोष्ठी में
पढता है ,पढवाता है
प्रकाशित करवाता है संग्रह
चर्चा होती है
करवाई जाती हैं चर्चाएँ
पुरस्कार पाता है
पाने के जुगाड़ करता है
प्रशंसाओं के पुल बांधे जाते हैं
पर उसमें जो लिखा है
उस बात पर एक कदम चलने में
मरने लगती है नानी
बात बोलती है जरूर
पर पैरों पर नहीं चलती
जिस रोज पैरों पर
चलने लगेगी बात
उस रोज सब कुछ बदल जायेगा |
मुझे इंतजार उस दिन का है
जब बात बोलेगी नहीं
सिर्फ चलेगी ,चलेगी |