Tuesday, 3 June 2014

यह अलग रास्ता है

कोई जगह ,
कोई समय ऐसा नहीं ,
जहां
यह सूर्य नहीं चमकता
बादल कितने ही काले ,
डरावने क्यों न हों
इसे ढक  नहीं पाते
किन्तु , यह अलग रास्ता है
सबसे अलग
अकेले पड़  जाने वाला
जहाँ खाने को घास की रोटियां हैं
छप्पन भोग नहीं
जो छप्पन भोग करने  और सोने के लोटों में
गंगाजल पीने वाले गीतों में शामिल हैं
वे न इस पर चलते हैं
न इस दिशा को
अपने गणित में शामिल करते हैं 


यह किसी मजहब, धर्म और देश से होकर
नहीं गुजरता
कोई जाति  भी यहां नहीं होती
धरती का हर कोना
इससे प्रकाशित होता है
देश इसे नहीं  बनाते
यह देशों को बनाता है
इतिहास इसके आँगन में खेलता है
भूगोल इसके पीछे पीछे चलता है
यह संस्कृति को
करवट की तरह बदल देता है

यह सूर्य की तरह कभी अस्त नहीं होता
चन्द्र की तरह कभी गर्म नहीं
यह आकाश की तरह निर्मल
धरती की तरह उदार
और सागर --सी गहराई लेकर 
इसे आत्मा के अपने राग की तरह
सबसे उदात्त और ऊंचे स्वर में ही गाया जा सकता है

Wednesday, 14 May 2014

सकारात्मकता जब तक
 ईमानदारी और त्याग के पांवों पर
चलती है ,एक हवा बनी रहती है
किन्तु जब बेईमान आँधियाँ
उसकी जगह लेने लगती  हैं
तो सकारात्मकता लंगड़ी हो जाती है
उसकी जगह  पर भेड़िये ,सियार
वैसे ही आ  जाते हैं 
जैसे जंगल में
 छोड़ी हुई शिकार को
खाने के लिए आ जाते हैं।

Tuesday, 13 May 2014

आज बुद्ध पूर्णिमा है। महात्मा बुद्ध जैसी महान हस्ती का जन्म दिन ,जिनको हमारे यहां के  पहले  समाज शास्त्री होने का गौरव  हासिल है।जो व्यक्ति को उसके मजहब , जाति  ,लिंग और औहदे से न देख कर केवल इंसान के रूप में देखते हैं। हजारों साल पहले  जीवनानुभवों से जितना उन्होंने सीखा उतना शायद ही किसी अन्य  व्यक्तित्त्व  ने सीखा हो। बुद्ध का महत्त्व आज भी इस रूप में है कि वे व्यक्ति को अपना पिछलगुआ नहीं बनाते। वे कहते हैं कि अपने दीपक आप बनो।  विवेकानंद उनके दर्शन से पूरी तरह सहमत नहीं थे फिर भी उन्होंने माना कि बुद्ध ही एक व्यक्ति थे ,जो पूर्णतया तथा यथार्थ में निष्काम कहे जा सकते हैं। वे मानते थे कि ---अपनी उन्नति अपने ही प्रयत्न से होगी। अन्य कोई इसमें तुम्हारा सहायक नहीं हो सकता। स्वयं अपनी मुक्ति प्राप्त करो। जबकि दूसरे महापुरुष अपने पीछे चलने की सलाह देते हैं।  वे मानते थे कि चीजें परिवर्तित  होती हैं।
 जो  लोग  दूसरों की  तरफ देखने के अभ्यस्त हो जाते हैं ,वे अपने हक़ की लड़ाई भी याचना भाव से लड़ते देखे  जाते हैं।  मेरी माँ अक्सर एक कहावत कहती थी  ----आस बिरानी जो करै , जीवत  ही मर जाय। दूसरे  की आशा मत करो , . दूसरे  की आशा करोगे तो उसका गुलाम बनकर रहने को अभिशप्त होना पडेगा।     

Friday, 9 May 2014

मैंने इस बहस को आज सुबह  २३ घंटे बाद पढ़ा। मैं इस पर चुप ही रहता ,किन्तु इसमें मेरा  नाम होने की वजह से मुझे  अपना पक्ष रखना जरूरी लग रहा है। मैं यहां बतला  दूँ कि इन कवियों पर 'पुनर्परीक्षण ' स्तम्भ के अंतर्गत एक श्रृंखला के रूप में --कृति ओर ---पत्रिका के पांच अंकों में विस्तार से  मैंने तब  लिखा था , जब विजेंद्र जी के हाथ में इस पत्रिका का पूर्ण सम्पादन था ,तब भी  यह इनकी कविता का पुनर्मूल्यांकन था , जिसमें इनकी सीमाओं का विशेष उल्लेख था। तब भी , जहां तक मुझे याद आ रहा है , इनको क्षद्म कवि जैसी संज्ञा प्रदान नहीं की गयी थी।  मैं इनकी कविताओं की सबसे बड़ी सीमा इनकी अंतर्वस्तु का विस्तार  न हो पाना मानता हूँ। जिसकी वजह इनके जीवनानुभवों का मध्यवर्ग तक सिकुड़ कर रह जाना है। ये जीवन का आलोचना धर्म तो निभाते हैं ,किन्तु उस अवस्था तक नहीं पहुँच पाते , जहां काल्पनिक ही सही , समता के  मुक्त भाव का साहचर्य पाठक को मिलता है।  क्षद्म कवि तो कवि होता ही नहीं। चूंकि ये कवि ,युवा वर्ग के आदर्श के रूप में पेश किये जाते  रहे  हैं  ,और मुक्तिबोध की कविता के बड़े प्रयोजन तक  को अनदेखा किया जा रहा था ,इसलिए भी यह उपक्रम जरूरी  आलोचना धर्म मानकर किया गया था।इसके अलावा नागार्जुन , केदार, त्रिलोचन की कविता की बड़ी जमीन  और उसकी परम्परा को  आँख ओट करने की रणनीति की आहटें आने लगी थी।चूंकि समाज में वर्ग विभाजन तेजी से बढ़ा है ,इस वजह से कविता का स्वरुप भी बदल रहा है।इसमें क्षद्म और असली की टक्कर  न होकर वर्गीय सीमाओं में संघर्ष की जो स्थितियां बनती  हैं , बहस उन पर होनी चाहिए।  इन आलोचनाओं की वजह से कई जगह मुझे ध्वंसकारी आलोचक के खिताब से भी नवाजा गया।  यह दरअसल तब भी होता है , जब हम प्रवृत्तियों को दरकिनार कर कुछ व्यक्तियों के  नामों से ही अपना काम निकलने लगते हैं।  हमारी बातें कविता से पुष्ट हों तो बात ज्यादा साफ़ और प्रामाणिक होगी। तात्कालिक  सरलीकृत सूत्र उत्तेजना तो पैदा कर सकते हैं ,कहीं पहुंचा नहीं सकते।

Wednesday, 7 May 2014

व्यापार की
एक ही नैतिकता होती है
सिर्फ व्यापार
व्यापार और केवल व्यापार
इसकी पहली शर्त है ---
धोखा , झूठ ,फरेब के
विभ्रमकारी
पहाड़ खड़े करना

व्यापारी जब
राजसत्ता से गलबहियां
लेने लगता है
और उससे  अपना नाता
दाम्पत्य में बदल लेता है
तो समझो बेड़ा  गर्क है
यही फर्क है
जब व्यापारी
जंगल का शिकारी बन जाता है
वह सबसे पहले
 आदमियत का चोला उतारता है
और खरगोशों का शिकार कर
स्वयं को धनुर्धर घोषित करा लेता है
वह गुण ,ज्ञान और जोग की खेप लादकर
ब्रज में प्रवेश करता है
अब यह गोपियों पर है कि
वे उसे कितना समझती हैं।

Tuesday, 6 May 2014

भानगढ़ अलवर जिले का एक सीमान्त ,किन्तु किंवदंतियों का एक ऐसा भग्न स्थल है ,जहां पहुँच कर इतिहास का एक ऐसा पृष्ठ आँखों के सामने होता है ,जो कभी अंधविश्वासों और सत्ता संघर्ष की भेंट चढ़ गया। यह आमेर नरेश और अकबर के सेनापति मान सिंह के छोटे भाई माधो सिंह की अपनी जागीर में बना हुआ था ,जो किसी  तांत्रिक सेवड़े की हरकतों से अंधविश्वासों की बलि चढ़ गया।  इस समय पुरातत्त्व विभाग इसकी देखरेख करता है और यह अलवर के पर्यटन स्थलों में से एक है। पहले यह आमेर और जयपुर का हिस्सा रहा ,बाद में जब अठारहवीं सदी  के अंत में एक नयी रियासत  अलवर बना ,तो यह उसके हिस्से में आया , या कहें प्रताप सिंह ने इसकी सीमा तक अलवर राज्य बना लिया।
शून्य सबको धारण करता है
इसलिए शून्य कभी रहा नहीं करता
जब हवा ज्यादा गर्म होती है तो
ऊपर उठ जाती है
उसकी जगह को उससे
ठंडी हवा घेर लेती है
इससे विक्षोभ पैदा होता है
 प्रकृति का यह नियम
एक व्यवस्था बनाता है
फिर भले ही वह
अव्यवस्था क्यों न हो

लेकिन दूसरा सच यह भी है कि
 ज्ञान और अनुभव
जब बरगद के पेड़ की जटाओं की  तरह
एकीभूत हो जाते हैं
तो आँधियाँ भी
अपना रास्ता बदल लेती हैं।