Tuesday, 11 August 2015

समय का बाज़ ------
चिड़ियों में खलबली है
कि समय का बाज़
मुंडेर पर आ बैठा है
उसके पंजों में खून लगा है
नाखूनों में सड़े मांस की दुर्गन्ध
चिड़ियों में बेचैनी है
कि कबूतर मार दिए जायेंगे
तोते उड़ा दिए जायेंगे
मैना की गर्दन मसक दी जायगी
गौरैया गीत गाना भूल जायगी
जंगल को उजाड़ वीरान कर दिया जायगा
बगीचों में मनाही कर दी जायगी
कि अब कोई दूसरा फूल नहीं खिल सकता
एक फूल एक रंग एक देश का सिद्धांत
जो नहीं मानेगा
राष्ट्रद्रोही कहलायगा
समय का बाज़ मुंडेर पर आ बैठा है
पहले जब चिड़ियों का राज था
वे मदहोश थी
सत्ता के रथ में बैठी
रसपान करती थी
अपने ही रक्त का
अपने भतीजे भाई थे
अपना परिवार था
राजनीति की दूकान में
अपना ही कारोबार था
जातियों के गणित लगाए जाते थे
सम्प्रदायों के सतूने
बिठाकर शतरंज की बाज़ी
जीत ली जाती थी
रथ आता तो घोड़ा पकड लिया जाता था
पर ऐसा कब तक हो सकता है
जब जमीन देने लगती है जबाव
आसमान भी अपना नहीं रहता
अर्थनीति आती थी विश्व बेंक से
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष
चिड़ियों का चुग्गा बनाता था
कुछ पिछलग्गू थे
जिनकी अपनी जमीन नहीं थी
बेखबर थे कि
बाज़ लगातार रणसंधि करने में लगा है
उसने कबूतरों के लिए पाठशालाएं खोली हैं
गाँव ---ढाणी से लगाकर
शहर --महानगर के हर मोहल्ले तक
जाल बिछ गया है
संगठनों का तराऊपर
घर घर में
मंदिर निर्माण की खुली चर्चा
तोते करते हैं
पेड़ों के नीचे सुबह सुबह
चिड़ियों को चुग्गा डाला जाता है
दिमाग की सिल पर ऐसी भंग पीसी जाती है
कि पीने वाला सुधबुध खो बैठता है
सब कुछ मालूम था कि
व्यापारी किसी का सगा नहीं होता
उसे जो चुग्गा डालता है उसका हो जाता है
उसे आपकी सूरत और सीरत से कुछ लेना देना नहीं
वह व्यापारी है पूंजी का दलाल है
उसके लिए सब कुछ जायज है , हलाल है
आपका इतिहास जो हो
उसे आप खुद भूल चुके हैं
वह अब न तुम्हारे काम का है
न तुम्हारे अनुचरों का
जहां सोच--विचार पर ताला जड दिया गया है
पेड़ों को ठूंठों में बदल दिया गया है
वहाँ गिद्धों को आमन्त्रण आपने दिया है
जहां गिद्ध आने लगते हैं
वहाँ आता है ---समय का बाज़ भी |

Sunday, 9 August 2015

१० अगस्त २०१५

बहुत से लोग आलोचक बनने से शायद इसलिए डरते हैं कि कोई भी रास्ते चलता उनके ऊपर अपनी उपेक्षा करने का आरोप लगा देगा |रचना संसार में जितने आरोप आलोचक पर लगे हैं क्या किसी अन्य पर लगे हैं ?

Friday, 7 August 2015

प्रतिशोध में भी जरूर थोडा बहुत प्रतियोगिता का भाव होता होगा ?अस्वस्थ भाव प्रतिशोध की ओर चला जाता है और स्वस्थ भाव प्रतियोगिता की ओर |
लाखों अग्म्भीरों से एक गंभीर ज्यादा श्रेयस्कर होता है क्योंकि वह बात को उदात्तता और ऊंचाई की ओर ले जाने में सहायक होता है |
अंगरेजी चाहे भारत की भाषा न हो किन्तु शासक---भारतीयों और बिचौलियों की भाषा तो है जिसका लोग आसानी से अनुकरण करने लगते हैं |यथा राजा तथा प्रजा कहावत यों ही तो नहीं बनी |
मन की बात में भी जब राजनीति हो , मन की बात नहीं रह जाती |
नीचे गिरना ही आसान होता है ऊपर जाने के लिए बहुत ऊर्जा और अभ्यास की जरूरत होती है |इसीलिये राजनीति में गिरना क्रिया का महत्त्व सबसे ज्यादा होता है |