बेवजह किसी के अच्छे कार्यों की तारीफ़ करने वाले लोग आज की विशुद्ध बाजारू दुनिया में विरल हैं। चतुर-चालाक लोग आदिकाल से हैं और चापलूसी तथा झूठी मुंह-देखी प्रशंसा ,किसी प्रयोजन को साधने के लिए करना लगभग हर व्यक्ति की आदत में होता है। . तटस्थता और निर्वैयक्तिकता बड़ी जीवन-साधना से आती है। जिसे किसी भी अस्त्र से परास्त नहीं किया जा सकता, उसे उसकी झूठी -प्रशंसा का अस्त्र एक सेकिंड में परास्त कर देता है।कवि लोग अपने आश्रयदाताओं की झूठी प्रशंसा करके इनाम ही नहीं , बड़ी-बड़ी जागीरें ले लेने की कोशिशें किया करते थे। अपनी प्रतिभा को इसी तरह आज का आदमी भी बेचता है। पुरस्कार-सम्मानों की दुर्गति भी ऐसे लोग कर दिया करते हैं।
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